वैक्सीन वैज्ञानिक डॉ. डेनिस एम किलनमैन का कहना है कि जानवरों जैसे सुअर, कुत्तों और पॉल्ट्री में इस तरह की डीएनए वैकसीन का प्रयोग होता है। माना जाता है कि इसके प्रयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर पड़ता है। हालांकि ये भी सच है कि अब तक मनुष्यों के लिए इस तरह की कोई भी वैक्सीन नहीं बनी है और न ही बड़े स्तर पर कोई प्रयोग हुआ है।
- परीक्षण के लिए चयन एक मुश्किल काम...
डॉ. इरविन बताते हैं कि किसी दवा के परीक्षण के लिए लोगों का चयन एक मुश्किल काम होता है। इसमें जोखिम होता है। परीक्षण में शामिल डॉ. एरविन की बहन हीथर विले का कहना है कि उन्हें परीक्षण में शामिल होने पर लैब आने जाने के लिए करीब सात हजार रुपये भी मिले। वे बताती हैं कि अमेरिका में लोगों को मरते देखा है। मुझे अपने घर-परिवार के लोगों की चिंता सताती है, रात को नींद नहीं आती है। यही सोच परीक्षण में शामिल हुई हूं।
- जेनेटिक कोड से सिर्फ तीन घंटे में बनी वैक्सीन
इनोवियो कंपनी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट केट ब्रॉडरिक बताते हैं कि जब दस जनवरी को चीन के शोधकर्ताओं ने कोरोना वायरस का जेनेटिक कोड जारी किया तो टीम ने उस सीक्वेंस को सॉफ्फटवेयर के जरिए कोड किया और फॉर्मूला तैयार कर लिया। एक विशेष प्राकृतिक पदार्थ से तीन घंटे के भीतर शाोधकर्ताओं ने कंप्यूटर इंजीनीयर्ड वैक्सीन तैयार कर ली।
- डीएनए वैक्सीन की यही खासियत होती है
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शियस डिसीज के प्रो. वोल्फगैंग लेटनर का कहना है कि डीएनए वैक्सीन की ऐसी ही खासियत होती है। हां कुछ कारण जरूर है जिससे इस बात का संदेह है कि कोरोना में डीएनए वैक्सीन का असर देखने को मिलेगा। हालांकि ये भी सच है कि इस तरह की वैक्सीन आसान होती है और तेजी से इसका निर्माण संभव है।
डीएनए वैक्सीन तकनीक पर कई दशक से काम चल रहा है। कई तरह के संक्रामक रोग जैसे एचआईवी और मलेरिया जैसे रोगों पर अध्ययन हो चुका है लेकिन अभी तक इस तरह की कोई वैक्सीन बाजार में नहीं है।
- पारंपरिक प्रथाओं के भी सहारे बचा सकते हैं जान
वैज्ञानिको ने वैष्णवों में सामाजिक दूरी व बार-बार हाथ धोने की आदत को लागू करने की सिफारिश की कोरोना से बचने के लिए दुनियाभर में जहां दवा और वैक्सीन की खोज चल रही है। वहीं, भारतीय वैज्ञानिक पारंपरिक प्रथाओं के जरिए लाखों जिंदगियां बचाने की सिफारिश कर रहे हैं। इनका मानना है कि सैकड़ों साल पुरानी इन प्रथाओं से आधुनिक विज्ञान के तरीकों को जोड़ा जा सकता है।
इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित एक अध्ययन में वैष्णव संप्रदाय की सामाजिक दूरी और बार-बार हाथ धोने जैसी आदतों को अन्य वर्गों तक पहुंचाने की सिफारिश की गई है। लेकिन वैष्णव संप्रदाय सिर्फ एक उदाहरण है। भारत में ऐसी अनेक प्रथाएं हैं, जिनके जरिए उनके समुदाय तक पहुंचा जा सकता है। डब्ल्यूएचओ के पूर्व महामारी रोग निदेशक डॉ. राजेश भाटिया का कहना है कि पारंपरिक पद्धतियों के काफी गहरे प्रभाव दिखाई देते हैं।
असम के कोकराझार स्थित एमआरएम मेमोरियल अस्पताल के डॉ. देवरक शर्मा का कहना है कि सोशल डिस्टैसिंग, बार बार हाथ धोने की आदत और मास्क लगाने जैसी आदतों का संदेश अध्यात्म, पारंपरिक प्रथा और समाज के वरिष्ठ नेताओं के जरिए पहुंचाया जा सकता है। शिलांग के इंदिरा गांधी रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल साइंसेज के एनॉटमी विशेषज्ञ डॉ. विश्वजीत सैकिया का कहना है कि जिला या स्थानीय स्तर पर जागरुकता लाने के लिए पारंपरिक प्रथाओं और धर्म गुरुओं की मदद लेना चाहिए।
- पहले वैष्णव संप्रदाय पर किया सर्वे
गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज के फॉरेसिंक विशेषज्ञ डॉ. रक्तिम प्रतिमा तामुल ने बताया कि प्रथाओं का प्रभाव जानने के लिए 100 वैष्णव अनुयायियों पर हुए अध्ययन में 65 फीसदी ने कहा वे खाना पकाने से पहले स्नान करते हैं। 50 फीसदी घर में प्रवेश से पहले स्नान करते हैं। बार-बार हाथ धोने की आदत पहले से ही है। रसोई घर में प्रवेश से पहले हाथ साफ करते हैं। 65 फीसदी ने बताया, वह स्नान के बाद साफ कपड़े पहनकर ही खाना पकाते हैं। खाना परोसते समय नाक स्कॉर्फ या गमछे से मुंह ढकते हैं।