महाराष्ट्र टॉस्क फोर्स के सदस्य डॉ. राहुल पंडित कहते हैं कि आज बिना लॉकडाउन के काम नहीं चल सकता। दूसरी लहर के कहर से पहले सरकार के पास तैयारी का पर्याप्त समय था। उस समय सरकार को वर्क फोर्स, बेड, ऑक्सीजन सप्लाई, कोरोना वैक्सीन और मेडिकल उपकरणों व दवा आदि के बारे में सोचना था।
अब तीसरी लहर के बारे में बताया जा रहा है कि उसमें एक साथ कोरोना के कई स्ट्रेन लोगों को अपनी चपेट में ले लेते हैं। उनके संक्रमण की रफ्तार मौजूदा स्ट्रेन से कई गुणा अधिक बताई गई है। वह एयरबोर्न से आगे की स्थिति बताई जा रही है। अगर मौजूदा समय में दूसरी लहर पर नियंत्रण नहीं होता है तो तीसरी लहर के कहर को शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
डॉ. रणदीप गुलेरिया के अनुसार, अब चुनौती ये है कि कोविड की संक्रमण चेन कैसे तोड़ी जाए। मेडिकल फोर्स अपनी क्षमता से बहुत आगे जाकर काम कर रही है। डॉक्टर दबाव में हैं। जिस तरह से लोग मारे जा रहे हैं, उससे डॉक्टरों एवं दूसरे मेडिकल कर्मियों को गहरा आघात लगता है। शुरू में कोरोना का स्पाइक कम था, इसे लोगों ने यह समझा कि अब कोरोना के नए केस नहीं आएंगे।
कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए जो विशेष अस्पताल बनाए गए थे, वहां सामान्य ओपीडी शुरू हो गई। कोविड केयर सेंटर पर ध्यान खत्म हो गया। नतीजा, अब दूसरी लहर में हम मुसीबत में फंसते जा रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी के चिकित्सक रहे डॉ. मोहसिन वली बताते हैं, मेडिकल आधारित ढांचे पर जो दबाव है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
जनवरी से लेकर मार्च तक सरकार के पास संभलने का बहुत वक्त था। डॉक्टरों के साथ जूनियरों की एक दूसरी वर्क फोर्स खड़ी की जा सकती थी। ऐसे मेडिकल स्टूडेंट या पेरामेडिकल स्टाफ जो अपने कोर्स या डिग्री के फाइनल वर्ष में हैं, उन्हें ट्रेनिंग देकर तैयार किया जा सकता था। इसके लिए उन्हें इन्सेंटिव दिया जा सकता है। एमडी में दाखिले के लिए कोई छूट दी जा सकती थी।
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में मेडिकल निदेशक के पद पर कार्यरत एक अधिकारी बताते हैं, दिसंबर 2020 से लेकर मार्च 2021 तक सरकार के पास संभलने का टाइम था। कई बलों में कोविड केयर सेंटर शुरू किए गए थे। बाद में उन्हें खत्म कर दिया गया। अब देश के छोटे शहरों और कस्बों में कोरोना महामारी को देखते हुए सरकार ने एम्स की मदद से प्रादेशिक ट्रेनिंग सेंटर खोलने का फैसला लिया है।
डॉक्टर रणदीप गुलेरिया के अनुसार, यहां पर कोविड-19 को लेकर डॉक्टरों को ट्रेनिंग दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिट डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें जस्टिस एल नागेश्वर राव और एस रवींद्र भट्ट भी शामिल थे, उन्होंने रविवार को मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र से कहा है कि दो सप्ताह के भीतर मरीजों को अस्पतालों में भर्ती करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए।
इस नीति को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा किया जाए। सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में यह बात मानी है कि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान मरीज को अस्पताल में बेड दिलाना, लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।