बांद्रा के शास्त्रीनगर और महाराष्ट्र नगर की झोपड़पट्टियों से बेस्ट के डिपो में जुटी भीड़ में अधिकांश मजदूर खाने-पीने की समस्या से परेशान थे, तो कई लोगों को गांव जाने कि चिंता सता रही है। इस झोपड़पट्टी क्षेत्र की 10 बाई 10 की एक झोपड़ी में 10 से 15 मजदूर रहते हैं।
पहले शिफ्ट में लोग आराम से रह लेते थे। लेकिन अब परेशानी हो रही है। जावेद बरमारे कहते हैं कि पश्चिम बंगाल से आए कुछ परिवार ऐसे हैं जो एक ही झोपड़ी में करीब दर्जनभर लोग रहते हैं। अब कोई काम नहीं है। रोज कमाने और खाने वाले मजदूरों का दिन-रात एक ही झोपड़ी में गुजारा नहीं हो रहा है। उनके पास पैसे की कमी तो है ही, रहने के लिए जगह भी मुअस्सर नहीं है।
कोरोना महामारी के संकट में जारी लॉकडाउन के बीच मजदूरों की एक और छोटी समस्या है लेकिन उनकी दृष्टि में वह बहुत बड़ी है। दरअसल, इस वक्त मजदूरों का एकमात्र सहारा मोबाइल फोन है, जिससे वे अपने गांव और परिवार में बात कर समय बिताते हैं।
बांद्रा पश्चिम से भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री आशीष शेलार ने बांद्रा स्टेशन पर भीड़ जुटने की घटना के बाद कई दिहाड़ी मजदूरों से उनकी समस्या के बारे में बात की। शेलार ने बताया कि अधिकतर मजदूर प्रीपेड मोबाइल नंबर इस्तेमाल करते हैं। अब रिचार्ज खत्म हो गया है और रिचार्ज करने वाली दुकानें भी बंद हैं। इसलिए गांव में परिवारवालों से भी संपर्क टूट गया है। इससे उनकी टेंशन और बढ़ी है।