मुश्किल वक्त हमें नई चीजें सीखने के लिए प्रेरित करता है। यही नई बातें जहां हमारा अस्तित्व बचाने में मदद करती हैं, वहीं आगे बढ़ने की ताकत भी देती हैं। लॉकडाउन ने भी वैसा ही किया।
घर से काम करना, नई तकनीकों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना, घर में ज्यादा समय व्यतीत करना, दोस्तों-रिश्तेदारों से आपसी संबंध फिर से प्रगाढ़ बनाना, मनोरंजन के नए तौर-तरीकों को स्वीकार करना, उन चंद बातों में शामिल हैं जो हमने कोरोना महामारी और उसके चलते लगे लॉकडाउन में सीखीं। आम भारतीयों पर इसका छोटे और बड़े स्तर पर क्या असर हुआ, इसे पूरे वर्ष हमारी दुनिया कितनी बदल गई, इस पर एक नजर...
घर से दफ्तर का काम
‘वर्क फ्रॉम होम’ ने लाखाें कर्मचारियों के जीवन पर डाला असर...
लॉकडाउन की वजह से ‘वर्क फ्रॉम होम’ यानी घर से ही ऑफिस का काम करने का चलन तेजी से बढ़ा। फ्रंटियर वर्कर्स को छोड़कर सभी पेशे में यह लागू हुआ। लॉकडाउन खुलने के बाद भी आईटी सहित कई सेक्टर कर्मचारियों से घर से काम करा रहे हैं। वर्क फ्रॉम होम जीवन का हिस्सा बन चुका है।
कंपनियां इसे फायदेमंद मान रही हैं तो कर्मचारी भी विभिन्न एजेंसियों के सर्वे में इससे खुश नजर आ रहे हैं। कोरोना के नए मामले जिस तरह महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में फिर मिल रहे हैं, लग रहा है कि वर्क फ्रॉम की आदत डाल लेनी होगी।
जब कर्मचारियों ने कही मन की बातें
तीन में से दो राजी : नवंबर, 2020 में ऑस्ट्रेलियाई रिसर्च एजेंसी पेपरजायंट के सर्वे में 83 फीसदी ने कहा कि घर से काम करने के बाद अब उनके लिए ऑफिस जाना मुश्किल होगा। 70 फीसदी बोले, घर से काम करके वे ज्यादा संतुष्ट हैं।
वेतन कटवाने को भी तैयार...
नवंबर 2020 में ही एजेंसी मेवरिक इंडिया ने सर्वे रिपोर्ट दी कि घर से काम करने पर 56 फीसदी भारतीय पेशेवरों की उत्पादकता बढ़ गई है। 34 फीसदी तो इस पर भी राजी हैं कि इसके लिए चाहें तो उनका वेतन 10 फीसदी तक कम कर लें। दरअसल, सर्वे में शामिल 81 फीसदी कर्मचारियों ने बताया कि ऑफिस आने-जाने में उनके दिन के 90 मिनट खर्च होते हैं, वर्क फ्रॉम होम से यह समय बचेगा।
ये भी होंगे फायदे
- 5520 रुपये हर महीने कर्मचारी बचा पाएंगे
- 1.47 घंटे तक रोजाना ऑफिस आने-जाने में खर्च नहीं होंगे
- 428 अतिक्ति कार्य घंटे के बराबर है यह समय, जो काम को दे सकेंगे।
लेकिन बाधाएं भी...
मैकेंजी एंड कंपनी की ग्लोबल इंस्टीट्यूट एनालिसिस के अनुसार, भारत जैसे विकासशील देश में केवल 16% कर्मचारी ही ऐसे हैं, जो घर से काम करें तो उसकी गुणवत्ता पर असर नहीं होगा। ब्रिटेन, जर्मनी, जापान जैसे विकसित देशों में यह तादाद 33 से 39 फीसदी है। देश के 46.4 करोड़ लोग कृषि, रिटेल और ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में काम करते हैं, जहां घर से काम करना अभी संभव नहीं है।