जेजे ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स ने अपने यहां कोरोना के संक्रमित मरीजों को लेकर एक शोध जारी किया है। शोध का मानना है कि किसी मरीज के शरीर में एंटीबॉडी 50 दिन से ज्यादा नहीं रहती हैं। शोध के मुख्य लेखक डॉ निशांत कुमार का कहना है कि हमने जेजे, जीटी और सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल के 801 स्वास्थ्य कर्मियों का अध्ययन किया, जिसमें 28 लोग कोरोना पॉजिटिव निकले।
इन 801 स्वास्थ्य कर्मियों का आरटी-पीसीआर की मदद से कोरोना का टेस्ट किया गया, जिसमें 28 लोग कोरोना पॉजिटिव निकले। जून में जब इन स्वास्थ्य कर्मियों का सीरो-सर्वे किया गया तो इन 28 मरीजों के शरीर में एंटीबॉडी नहीं मिली। ये सूचना शोध के प्री-प्रिंट के मुताबिक है, सितंबर में इसे इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कम्यूनिटी मेडिसिन और पब्लिक हेल्थ में छापा जाएगा।
डॉ कुमार ने बताया कि इसके अलावा जेजे अस्पताल सीरो सर्वे में तीन हफ्ते और पांच हफ्ते पहले 34 और मरीज कोविड-19 से संक्रमित निकले। तीन हफ्ते वाले समूह में 90 फीसदी मरीजों में एंटीबॉडी थी और पांच हफ्ते वाले समूह में 38.5 फीसदी मरीजों में एंटीबॉडी थी।
एंटीबॉडी पर चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि किसी मरीज के शरीर में एंटीबॉडी होने से उसे दोबारा कोरोना वायरस नहीं हो पाता है लेकिन हांगकांग में एक शख्स को दोबारा कोरोना वायरस होने से स्वास्थ्य महकमों में हड़कंप मच गया है। इसी शोध का एक और विश्लेषण दिखाता है कि एंटीबॉडी जल्द ही गल जाती है।
डॉ कुमार कहते हैं कि इन विश्लेषणों के आधार पर वैक्सीन रणनीतियों पर दोबारा काम करने की जरुरत है। इस शोध की रिसर्च टीम कहती है कि कोरोना संक्रमित मरीजों को वैक्सीन की एक डोज के बजाय ज्यादा डोज देनी चाहिए। भारत के पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन के महामारीविद गिरीधर आर बाबू का कहना है कि जेजे अस्पताल में 28 कोरोना मरीजों एसिम्प्टोमैटिक थे या उनमें कोरोना के लक्षण थे।
विश्व में हुए अन्य शोध बताते हैं कि जो कोरोना मरीज एसिम्प्टोमैटिक हैं, उनमें गंभीर कोरोना मरीजों या सिम्प्टोमैटिक मरीजों की तुलना में कम एंटीबॉडी बनती हैं। जो मरीज लंबे समय से सिम्प्टोमैटिक कोरोना का शिकार रहे उनके शरीर में तीन से चार महीने के लिए एंटीबॉडी बनी रहती हैं।
मुंबई के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि अभी भी कोविड-19 संक्रमण के लिए इम्यूनिटी की प्रणाली पर कई तरह के शोध जारी हैं। उन्होंने कहा कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि ये इम्यूनोग्लोबिन जी नहीं है। इम्यूनोग्लोबिन जी सबसे ज्यादा पाई जाने वाली एंटीबॉडी होती है।
डॉक्टर का मानना है कि शरीर में पैदा होने वाली ये एंटीबॉडी या तो टी सेल्स हैं या न्यूट्रालाइजिंग एंटीबॉडी है कोरोना के खिलाफ इम्यूनिटी बनाने में काम करता है। बीएमसी एक डॉक्टर का कहना है कि एंटीबॉडी को लेकर किए जा रहे शोध की प्रणाली उचित नहीं है।
डॉक्टर का कहना है कि हमें सीरियल सीरो-सर्वे करने की जरुरत है। डॉक्टर ने कहा कि एक अवधि के लिए एक ही मरीज में एंटीबॉडी का स्तर देखा जाए ताकि ये पता लगाया जा सके कि किस दौरान एंटीबॉडी गल रही है या कम हो रही है।