देश में कोविड के मामलों में कमी आने के बावजूद इंडियन सार्स-कोव-2 जीनोमिक कंसोर्टियम (आईएनएसएसीओजी) 'सार्स कोव-2' की जीनोम सिक्वेंसिंग को लेकर सतर्क है। इस वायरस पर निगरानी रखने के लिए जीनोम सिक्वेंसिंग का विस्तार दक्षिण एशिया के अन्य देशों तक करने की योजना है। आईएनएसएसीओजी हर महीने 8000-9000 नमूनों का विश्लेषण कर रहा है। भारत में सार्वजनिक निगरानी नेटवर्क के जरिये रोजाना एसएआरआई के 1 से 1.5 लाख मरीजों के नमूने एकत्रित किए जा रहे हैं। इन नमूनों में 1 फीसदी मरीज कोविड-19 से ग्रस्त निकल रहे हैं।
आईएनएसएसीओजी में टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) में कोविड कार्य समूह के चेयरमैन एनके अरोड़ा ने कहना है कि देश में अभी कोरोना के नए मामले 2000 के स्तर से नीचे हैं। लेकिन भारत में सांस के संक्रमण 'सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन' (एसएआरआई) से प्रभावित 1 से 1.5 लाख मरीजों के नमूने एकत्रित किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, हमने महामारी के दौरान नया सिस्टम आईएनएसएसीओजी विकसित किया और इसकी भूमिका कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। यह नेटवर्क विषाणु के विकास पर करीबी नजर रखता है और भविष्य की महामारी से निपटने के लिए संभावित इंतजामों की नींव रखता है। भारत की योजना आईएनएसएसीओजी नेटवर्क का विस्तार दक्षिण एशिया के देशों तक करने और साझा प्रयासों के जरिये विषाणु पर कड़ी निगरानी रखने की है।
उन्होंने कहा कि इसमें कई तरह से निगरानी की जा रही है। इसमें नाले (सीवेज), अस्पतालों में भर्ती कोविड 19 मरीजों और एसएआरआई नमूने लिए जा रहे हैं। हम अस्पतालों में भर्ती कोविड के मरीजों के नमूनों की जीनोम सैंपलिंग कर रहे हैं। हम सीवेज से भी नमूने ले रहे हैं। हम एसएआरआई के मरीजों के एकत्रित नमूनों से जीनोम सिक्वेंसिंग कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि हम कोविड-19 पीड़ित सभी मरीजों के नमूनों की जीनोम सैंपलिंग कर रहे हैं। भारत ने इस साल सीवेज से भी नमूने एकत्रित करना शुरू किया। इससे पर्यावरण पर निगरानी रखी जाती है। भारत ने पोलियो अभियान के दौरान भी ऐसा किया था। दुनिया में बहुत कम देशों के पास यह तकनीक व क्षमता है कि वे सीवेज के पानी में विषाणु के कणों का पता लगा पाएं।
इस प्रोटोकॉल ने वातावरण में विषाणु के संक्रमण पर निगरानी रखने का तरीका विकसित किया है। कोविड संक्रमित कई लोगों में इस बीमारी के लक्षण नहीं आ रहे हैं और हल्के बुखार जैसे लक्षण आ रहे हैं। इसलिए कई लोग आरटी-पीसीआर टेस्ट नहीं करवा रहे हैं। इससे आईएनएसएसीओजी के लिए नमूनों से जीनोम सिक्वेंसिंग में गिरावट आ रही है। लिहाजा ऐसे समय में पर्यावरण पर नजर रखना जरूरी हो गया है। इससे कोविड के सक्रिय स्वरूपों को पकड़ने में मदद मिलती है और संक्रमण के भौगोलिक रुझानों की जानकारी मिलती है।