कोरोना संक्रमितों के लिए डीआरडीओ की दवा 2डीजी का पहला बैच जारी कर दिया है। 2डीजी दवा इसलिए खास है कि यह सीधे मरीज की कोशिकाओं पर काम करेगी, जिससे इम्यून सिस्टम तेजी से ठीक होगा। इस दवा को 5 से 7 दिन तक डॉक्टर की सलाह पर खाना होगा।
हैदराबाद स्थित डॉ. रेड्डी फॉर्मा कंपनी ने 2डीजी दवा का उत्पादन शुरू किया है। एक पैकेज में 10 पाउच होंगे और हर पाउच में 2.34 ग्राम पाउडर होगा जिसे ओआरएस घोल में मिलाकर सेवन कर सकते हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि एंटी कोविड दवा 2डीजी दवा को तैयार करने में जिन वैज्ञानिकों की मुख्य भूमिका है, वे उन्हें सम्मानित करेंगे। उन्होंने कहा कि ये दवा आशा और उम्मीद की एक नई किरण लेकर आई है। इसके साथ ही यह दवा हमारे देश के वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक क्षमता की एक मिसाल है।
देश में कोरोना महामारी ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं। मरीजों जल्द से जल्द ठीक करने के लिए डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने एंटी कोविड दवा 2डीजी का निर्माण किया है और यह कोरोना मरीजों के इलाज में सफल है।
वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि मई के महीने में यह दिन सबके लिए सबसे ज्यादा सुखद दिन है। हम एक साल से ज्यादा समय से कोविड की जंग लड़ रहे हैं। रक्षा क्षेत्र के आउटकम के तहत ये हमारी पहली स्वदेशी दवा है, ये कोविड वायरस के प्रकोप को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कम करने की पूरी क्षमता रखती है।
डीआरडीओ के प्रमुख जी. सतीश रेड्डी ने कहा कि यह दवा कोरोना वायरस से संक्रमित कोशिकाओं पर सीधा काम करेगी। शरीर का इम्यून सिस्टम काम करेगा और मरीज जल्दी ठीक होगा। इसे मरीज के वजन और डॉक्टर के प्रिसक्रिप्शन के आधार पर पांच से सात दिन दिन में दो बार खुराक लेनी है।
एम्स सहित कुछ अस्पतालों को ही मिली पहली खेप
उन्होंने बताया कि दवा के पहले बैच में 10 हजार खुराक हैं जिन्हें एम्स, डीआरडीओ के अस्पताल और सैन्य अस्पतालों में उपलब्ध कराई है। बाकी राज्यों को अगले चरण में यह दवा देंगे। इसमें कुछ सप्ताह का वक्त लग सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि जून के पहले हफ्ते से सभी जगहों पर 2डीजी दवा की उपलब्धता आसान होगी लेकिन फिलहाल यह सीधे अस्पताल और कोविड सेंटर पर ही मिलेगी।
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किसने बनाया है?
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अप्लायड साइंसेज के डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज के साथ बनाया है।
कैसे काम करती है?
दवा में मौजूद अणु मरीजों को तेजी से ठीक करते हुए ऑक्सीजन पर निर्भरता घटाते हैं। यह दवा संक्रमित कोशिकाओं में एकत्र होकर वायरस को बढ़ने से रोकती है। वायरस सिंथेसिस बंद हो जाता है, बाकी वायरस भी मरने लगता है।
क्लीनिकल ट्रायल
अप्रैल 2020 में पहला ट्रायल हुआ था। मई में दूसरे चरण के ट्रायल को मंजूरी मिली। दूसरे चरण में डीआरडीओ और साझेदार डीआरएल ने मई-अक्तूबर के बीच 110 मरीजों पर इसका परीक्षण किया। दूसरे चरण का ए फेज छह अस्पतालों में हुआ तो फेज बी देशभर के 11 अस्पतालों में हुआ। दूसरे चरण की सफलता के बाद नवंबर 2020 में तीसरे चरण को मंजूरी मिली। दिसंबर 2020 से मार्च 2021 तक दिल्ली, राजस्थान, यूपी, प. बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र के 27 अस्पतालों में 220 मरीजों पर ट्रायल हुआ।