अर्थव्यवस्था पर कोरोना का असर (सांकेतिक तस्वीर)
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महामारी का असर अर्थव्यवस्था के साथ अब लोगों की जेब पर भी पड़ रहा है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ने बृहस्पतिवार को एक रिपोर्ट में कहा कि कोविड-19 संक्रमण ने कमाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। यही वजह है कि लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बचत को खर्च कर रहे हैं। वहीं, बचत के धीरे-धीरे खत्म होने के कारण लोग अब खर्च में भी कटौती करने लगे हैं। दूसरी लहर के बाद आर्थिक गतिविधियां भले ही शुरू हो चुकी हैं, लेकिन बचत बढ़ाने की लोगों की चाहत से खर्च में कमी बनी रह सकती है।
रेटिंग एजेंसी ने कहा कि पिछले साल के मुकाबले इस साल मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात पर महामारी का असर कम हुआ है, लेकिन सेवा क्षेत्र की गतिविधियां काफी घटी हैं। खपत के बारे में बताने वाले वाहनों की बिक्री के संकेतक में मई 2021 के दौरान तेज गिरावट आई। अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार के बावजूद ग्राहकों की धारणा अब भी निचले स्तर पर है।
राहत पैकेज की संभावना नहीं
एसएंडपी का कहना है कि महंगाई आरबीआई के 6 फीसदी लक्ष्य के स्तर पर बनी हुई है। इसलिए नीतिगत दरों में कटौती की गुंजाइश नहीं होने की वजह से केंद्रीय बैंक की नीतियां उदार बनी रह सकती हैं। लेकिन, सरकार की ओर से कोई राहत पैकेज मिलने की संभावना नहीं है। इसके अलावा, सरकार ने दूसरी लहर के पहले ही 2021-22 के आम बजट में राजकोषीय घाटे के लिए 9.5 फीसदी का लक्ष्य तय किया था। इसलिए उसके पास अब खर्च बढ़ाने की भी गुंजाइश नहीं है।
वृद्धि दर अनुमान घटाकर 9.5 फीसदी किया
रेटिंग एजेंसी ने 2021-22 के लिए भारत के आर्थिक वृद्धि अनुमान को 11 फीसदी से घटाकर 9.5 फीसदी कर दिया है। साथ ही कहा कि अभी तक सिर्फ 15 फीसदी आबादी को ही टीका लग पाया है, जिससे महामारी से जुड़े जोखिम आगे भी बने रह सकते हैं। दूसरी लहर के कारण अप्रैल-मई में लॉकडाउन लगाए जाने से आर्थिक गतिविधियों में तेजी से गिरावट आई।
सुधार 2020 के अंतिम और 2021 के शुरुआती दिनों के मुकाबले कम रह सकता है। इसलिए हमने वृद्धि दर अनुमान में कटौती की है। एसएंडपी ने कहा कि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को कारोबार में स्थायी तौर पर हुए नुकसान के कारण आर्थिक वृद्धि दर अगले दो साल तक सुस्त रह सकती है। इसलिए 31 मार्च 2023 को समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के दौरान वृद्धि दर 7.8 फीसदी रह सकती है।