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NEET-PG में कट-ऑफ घटाने पर विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती पर केंद्र ने बनाई हाई-पावर्ड कमेटी; कब आएगी रिपोर्ट?

Tue, 04 Aug 2026 07:33 PM IST
प्रशांत तिवारी पीटीआई, नई दिल्ली

सार

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि नीट-पीजी एडमिशन प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा और आंतरिक ऑडिट के लिए DGHS की अध्यक्षता में 12 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी बनाई गई है। सरकार का कहना है कि कट-ऑफ कम करना पहले भी होता रहा है और इसका उद्देश्य खाली सीटों को भरना है, जबकि याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इससे मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने नीट-पीजी के माध्यम से होने वाली पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एडमिशन प्रक्रिया के मौजूदा सिस्टम का व्यापक आंतरिक ऑडिट कराने के लिए डायरेक्टर जनरल ऑफ हेल्थ सर्विसेज (DGHS) की अध्यक्षता में एक हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी का उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करना, उसकी कमियों की पहचान करना और उन्हें दूर करने के लिए व्यावहारिक एवं प्रभावी समाधान सुझाना होगा।

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सुप्रीम कोर्ट में किस मुद्दे पर सुनवाई चल रही है?
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ नीट-पीजी 2025 की क्वालिफाइंग परसेंटाइल कट-ऑफ में की गई कमी को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

सरकार ने कोर्ट को पैनल के बारे में क्या बताया?
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के मौखिक निर्देशों के बाद 23 जुलाई को एक अधिसूचना जारी कर 12 सदस्यीय हाई-पावर्ड कमेटी बनाई गई है। इस समिति की अध्यक्षता DGHS करेंगे।
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कमेटी का काम क्या होगा?
सरकार के अनुसार समिति नीट-पीजी माध्यम से होने वाली एडमिशन प्रक्रिया के मौजूदा सिस्टम का आंतरिक ऑडिट करने की रूपरेखा तैयार करेगी। साथ ही, मौजूदा व्यवस्था की कमियों की पहचान कर उनके लिए व्यवहारिक और लागू किए जा सकने वाले समाधान सुझाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को कितना समय दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए समिति को अपनी रिपोर्ट दाखिल करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट आने के बाद इस पूरे मामले पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

क्या समिति में अन्य संस्थानों के सदस्य भी शामिल हो सकते हैं?
पीठ ने कहा कि आवश्यकता होने पर समिति नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) और नेशनल कमीशन फॉर होम्योपैथी (NCH) के प्रतिनिधियों को भी शामिल कर सकती है।

कट-ऑफ कम होने पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता क्या है?
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह यह जांच करेगा कि नीट-पीजी 2025-26 की क्वालिफाइंग कट-ऑफ में भारी कमी का पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है या नहीं। अदालत ने यह भी कहा था कि भले ही केंद्र का यह तर्क सही हो कि नीट-पीजी, MBBS में प्रवेश की परीक्षा नहीं है और इसमें शामिल सभी उम्मीदवार पहले से योग्य डॉक्टर हैं, फिर भी कट-ऑफ में भारी कमी के प्रभाव का परीक्षण आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं ने क्या आरोप लगाए हैं?
सोशल वर्कर हरिशरण देवगन, डॉ. सौरव कुमार, डॉ. लक्ष्य मित्तल और डॉ. आकाश सोनी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं। उनका कहना है कि कट-ऑफ में की गई कमी संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है। इस मामले में हरिशरण देवगन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद और अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत अदालत में पेश हुए।

किस नोटिस को चुनौती दी गई है?
याचिकाकर्ताओं ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) के 13 जनवरी के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसके तहत नीट-पीजी 2025-26 की काउंसलिंग के तीसरे चरण के लिए न्यूनतम क्वालिफाइंग परसेंटाइल कट-ऑफ घटा दी गई थी।

सरकार ने अपने हलफनामे में क्या कहा?
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि यह निर्णय पूरी तरह से एक शैक्षणिक और नीतिगत फैसला है, जिसे नेशनल मेडिकल कमीशन अधिनियम, 2019 के तहत सक्षम वैधानिक प्राधिकारियों ने जनहित और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर लिया है।

क्या पहले भी कट-ऑफ कम की जाती रही है?
सरकार ने अदालत को बताया कि नीट-पीजी में क्वालिफाइंग परसेंटाइल कम करना कोई नई प्रक्रिया नहीं है। वर्ष 2017 से परीक्षा शुरू होने के बाद जब भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की स्थिति बनी, तब कट-ऑफ में कमी की गई। हलफनामे में यह भी कहा गया कि शैक्षणिक सत्र 2023 में सभी श्रेणियों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल घटाकर शून्य तक कर दिया गया था। इसलिए मौजूदा फैसला भी स्थापित नीति और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप है।

सरकार ने परीक्षा के उद्देश्य को कैसे स्पष्ट किया?
केंद्र सरकार ने कहा कि नीट-पीजी के अंक उम्मीदवारों के आपसी प्रदर्शन और परीक्षा की कठिनाई के आधार पर तय होते हैं। इन्हें किसी डॉक्टर की क्लिनिकल क्षमता का पैमाना नहीं माना जा सकता। सरकार ने स्पष्ट किया कि नीट-पीजी का उद्देश्य न्यूनतम योग्यता तय करना नहीं है, क्योंकि वह उम्मीदवार की एमबीबीएस डिग्री से पहले ही प्रमाणित हो जाती है। इस परीक्षा का मकसद केवल सीमित पोस्टग्रेजुएट सीटों के लिए मेरिट सूची तैयार करना है।

नीट-पीजी में शामिल होने की पात्रता क्या है?
सरकार ने बताया कि परीक्षा में शामिल होने के लिए उम्मीदवार के पास मान्यता प्राप्त एमबीबीएस डिग्री होना और अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप पूरी करना आवश्यक है।

सरकार ने खाली सीटों का क्या आंकड़ा पेश किया?
हलफनामे के अनुसार, शैक्षणिक सत्र 2025-26 में लगभग 70,000 PG सीटें उपलब्ध थीं, जबकि कुल 2,24,029 उम्मीदवारों ने परीक्षा दी। इनमें ऑल इंडिया कोटा (AIQ) के तहत 31,742 सीटें थीं। दूसरे राउंड की काउंसलिंग के बाद AIQ की 9,621 सीटें खाली रह गई थीं। इनमें 5,213 सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों, AIQ और DNB संस्थानों की थीं।

सरकार ने निजी मेडिकल कॉलेजों को फायदा पहुंचाने के आरोपों पर क्या कहा?
केंद्र ने कहा कि कट-ऑफ घटाने का उद्देश्य निजी मेडिकल कॉलेजों को लाभ पहुंचाना नहीं था, बल्कि सरकारी और निजी दोनों संस्थानों में बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने से रोकना था। सरकार के अनुसार सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें सार्वजनिक धन से बनाई जाती हैं, इसलिए उनका खाली रहना जनहित के विपरीत है।

नीतिगत फैसलों पर अदालत के दखल को लेकर सरकार का क्या तर्क है?
सरकार ने कहा कि न्यायालयों का स्थापित सिद्धांत है कि वे विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा लिए गए शैक्षणिक और नीतिगत निर्णयों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करते, जब तक वे स्पष्ट रूप से मनमाने, दुर्भावनापूर्ण या संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले न हों।

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कट-ऑफ घटने के बाद कितने नए उम्मीदवार पात्र हुए?
इससे पहले NBEMS ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि क्वालिफाइंग कट-ऑफ कम किए जाने के बाद 95,913 अतिरिक्त उम्मीदवार नीट-पीजी 2025 की काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए। NBEMS के नोटिस के अनुसार, जनरल कैटेगरी के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ 50वें परसेंटाइल से घटाकर 7वें परसेंटाइल पर कर दी गई है।

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