सियासी महकमे से होने वाली बयानबाजियों के ज्वार-भाटे के बीच हिंदूओं के शीर्ष धर्मगुरुओं में से एक शंकराचार्य का विवादित बयान एकबार फिर सुनामी की तरह बरपा है। हालांकि ये सुनामी उस अकाल को लेकर है, जो देश के सामने ठीक मुंह बाए खड़ा है। बात सूखे पर दिए गए शंकराचार्य के बयान की है। जहां एक ओर तमाम सरकारें और गैर सरकारी संगठन सूखे से निपटने के लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर रहे हैं वहीं हरिद्वार में मीडिया से रूबरू स्वामी ने ये कहकर सबको चौंकाया कि 'सूखे के लिए साईं जिम्मेदार हैं।'
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शंकराचार्य वैसे तो धर्म गुरू हैं लेकिन बयानबाजी के सियासी दांव-पेंच खूब समझते हैं। देश के बहुसंख्यक मानस का ध्यान कैसे अपनी ओर खींचा जाए ये भी बखूबी जानते हैं। साईं भगवान हैं या फकीर ये तो वो ही जानें लेकिन शंकराचार्य की मानें तो वे अपनी पुरानी बात पर अटल हैं। बतौर शंकराचार्य साईं एक फकीर थे। जिनकी जगह मंदिर में नहीं होनी चाहिए। उन्हें भगवान करार नहीं दिया जा सकता।
शंकराचार्य की मानें तो अयोग्य लोगों को भगवान की तरह पूजने से ही आपदाओं का माहौल बना है। महाराष्ट्र के ज्यादातर लोग साईं को पूजते हैं इसलिए महाराष्ट्र का सूखा भी साईं की देन है। उन्होंने एकबार फिर आह्वान किया कि घरों और मंदिरों से साईं की मूर्तियां तत्काल प्रभाव से बाहर कर देनी चाहिए। शंकराचार्य का ये ताजा बयान है जिसपर आम और खास जनों के बीच घमासान मचा है। ऐसे ही उनके तमाम और विवादित बयान हैं, जिनका चिट्ठा हमने तैयार किया है। आगे की स्लाइड में डालिए एक नजर शंकराचार्य के बाकी बिवादित बोलों पर...
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'शनि मंदिरों में महिलाएं प्रवेश करेंगी तो यौन अपराध बढ़ेंगे'
फकीर के बाद देवता भी रडार पर, निशाने पर महिलाएं
- फोटो : gettyimages
फकीर तो फकीर, देवता भी निशाने की जद में आ गए। रडार पर शनिदेव हैं। शंकराचार्य की मानें तो शनिदेव दरअसल एक 'पाप ग्रह' हैं। महिलाएं अगर शनि के मंदिरों में प्रवेश करेंगी तो उनके साथ पाप-अत्याचार बढ़ेंगे। शनि की पूजा करने से उन्हें दरिंदगी का सामना करना पड़ेगा। महिलाओं के प्रति यौन अपराध बढ़ेंगे।
शंकराचार्य का ये बयान महाराष्ट्र के शनि सिंगणापुर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर आया। हाल ही में सिंगणापुर में हाईकोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी है।
इससे पहले सिंगणापुर में केवल पुरुषों के प्रवेश पर ही हरी झंडी थी। ये मुद्दा देश में बड़ी बहस की वजह बना। आखिरकार मानवीय संवेदनाओं और आस्था में सबकी बराबरी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने बराबरी का फैसला सुनाया लेकिन शंकराचार्य की दलील आनी बाकी थी सो आ गई।
कुलमिलाकर ये उनका एक और ताजा ही विवादित बयान है जो साईं के साथ आया। सोशल मीडिया और बहसों में उनके बयानों पर आलोचनाओं का दौर तेजी पर है।
इस्कॉन पर शंकराचार्य के बोल
'इस्कॉन का पैसा अमेरिका जाता है'
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इसी साल फरवरी में शंकराचार्य के बयान से वे लोग आहत हो गए जो इस्कॉन परिवार के सदस्य हैं। इस्कॉन यानी अंतरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ। सनातन धर्म की शिक्षाएं कालों, गोरों और सब तक पहुंचाने के लिए साल 1966 में ए.सी. भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क में इस्कॉन की बुनियाद रखी।
वर्तमान में दुनियाभर में इसके 550 सेंटर हैं। भारत में भी तकरीबन हर बड़े शहर में भव्य इस्कॉन मंदिर है। भक्ति योग और कृष्णभावनामृत पढ़ाने वाली ये संस्था भी द्वारका मठ के शंकराचार्य के निशाने पर आ गई।
शंकराचार्य ने कहा कि इस्कॉन मंदिर का पैसा अमेरिका ले जाया जाता है। इसकी वजह है कि इस्कॉन अमेरिका के न्यूयॉर्क में पंजीकृत संस्था है।
सनातन साहित्य यानी वेदांत का कोई भी ग्रंथ उठा कर देखा जाए तो पूरी मानव जाति और संसार के सरोकारों से जुड़ी बातें सामने आती हैं। लेकिन पैसों की बात पर उसी वेदांत के स्वामी शंकराचार्य को इस मानवजाति और संसार में भेद नजर आने लगता है। भारत और अमेरिका नजर आते हैं। देश का धन लुटता हुआ नजर आता है।
कुल मिलाकर हम क्यों कहें, देश के ज्यादातर बुद्धिजीवियों के मत में इस्कॉन पर दिया गया शंकराचार्य का बयान विवादित था।
'ताजमहल के नीचे शिवमंदिर है'
ताजमहल पर शंकराचार्य का प्रकोप!
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बीते साल भी शंकराचार्य ने अपने बयानों के जरिए भक्तों का ध्यान तो खींचा है मीडिया की खूब फुटेज भी बटोरी। अप्रैल 2015 में शकराचार्य का एक बयान तकरीबन हर घर और हर प्राइमटाइम का हिस्सा बना। बात सात अजूबों में से एक मोहब्बत की निशानी ताजमहल को लेकर थी। शंकराचार्य ने दावा ठोंक दिया कि ताजमहल शिव मंदिर के ऊपर बनाया गया। यानी ताजमहल के नीचे शिवलिंग है।
शंकराचार्य की मानें को उन्होंने देश की सर्वोच्च अदालत में इस बात की अर्जी भी दे रखी है कि हिंदुओं को ताजमहल के नीचे बने शिवलिंग को पूजने दिया जाए और जो मस्जिदें या मकबरे हिंदु मंदिरों को नुकसान पहुंचाकर बनाए गए हैं उन्हें हिंदुओं को वापस किया जाए।
ताजमहल शिवमंदिर है, ऐसा दावा देश के कई और भी संगठन करते रहे हैं। हालांकि मोदी सरकार ने संसद में एक एक सवाल के जवाब में इन सभी दावों को खारिज कर दिया।
शंकराचार्य का ये बयान देश की 15 फीसदी से ज्यादा मुसलिम आबादी के गले के नीचे नहीं उतरा, यहां तक की बहुत से हिंदु बुद्धिजीवियों और आलोचकों ने भी इस बयान की निंदा की। कुल मिलाकर शंकराचार्य का ये बयान भी विवादित ही रहा।
भारत राम-कृष्ण का देश है, मोदी गांधी और बुद्ध का नाम लेते फिर रहे हैं'
गांधी-बुद्ध भी आए निशाने पर
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बीते साल दिसंबर में शंकराचार्य के निशाने पर राजा शुद्धोदन के सुपुत्र सिद्धार्थ यानी भगवान बुद्ध आए। निशाना पीएम मोदी के कंधे से लगाया गया था। पत्रकारों ने शंकराचार्य से देश में असहिष्णुता को लेकर सवाल किया तो जवाब में शंकराचार्य ने कहा कि पीएम मोदी इस मुद्दे से घबरा गए हैं। शंकराचार्य ने कहा कि पीएम मोदी लंदन यात्रा पर गए तो उन्होंने भारत को राम-कृष्ण का देश बताने के बजाय गांधी और बुद्ध का देश बताया। आखिर बुद्ध ने ऐसा क्या किया?
उन्होंने यहां तक कहा कि अंबेडकर ने खुद अपनी जाति बना ली। कोई बुद्ध को नहीं मान रहा है। इसी दौरान असहिष्णुता की परिभाषा समझाते हुए उहोंने एक और दलील पेश की।
शंकराचार्य ने कहा कि अगर हिंदु लड़की मुसलमान लड़के से शादी करती है तो वह उस समाज में भी अपने अनुसार मान-सम्मान चाहती है। ऐसे में अगर वे लोग लड़की के अनुसार मान-सम्मान नहीं देते हैं तो वे असहिष्णु हो जाते हैं।
तिब्बत में दलाईलामा, वेटिकन में पोप की तरह सनातन धर्म में शंकराचार्य का पद सबसे ऊपर है। वेदांत के विद्वान ही इस पद के काबिल समझे जाते हैं। ऐसे में साईं, शनि और तमाम मुद्दों पर आने वाले विवादित बयान क्या इस पद की गरिमा पर सवाल खड़े नहीं करते हैं? एक सीधा सवाल ये भी है कि क्या शंकराचार्य निजी खुन्नस में ऐसे बयान दे रहे हैं?