भारत न्याय रिपोर्ट (आईजेआर) की उपभोक्ता न्याय रिपोर्ट चौंकाने वाली है। देश में 2021 से 2025 तक उपभोक्ता अदालतों में 5 लाख से अधिक मामलों का बैकलॉग और भारी संख्या में रिक्त पद उपभोक्ता निवारण प्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। यह उपभोक्ता अदालतों के कामकाज के आकलन पर आधारित अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (एससीडीआरसी) में अध्यक्षों और सदस्यों के आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं। 2020 और 2024 के बीच, लंबित मामलों की संख्या 21 प्रतिशत बढ़कर 87,545 से 5.15 लाख हो गई। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत मामलों को 3-5 महीने की समयसीमा के अंदर सुलझाने का प्रावधान है, लेकिन रिपोर्ट में पाया गया कि एक-तिहाई से अधिक मामले तीन साल से भी अधिक समय तक अनसुलझे रहे, जो निर्धारित समय-सीमा से कहीं ज्यादा है। केरल, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में 70 से 80 फीसदी मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं।
रिपोर्ट जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एसके कौल ने खाली पदों के भारी संकट और लंबित मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई और कहा कि ये उपभोक्ता निवारण तंत्र में उपभोक्ताओं के भरोसे को कम कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उपभोक्ता मुख्य रूप से सेवाओं में कमी को लेकर परेशान और असंतुष्ट हैं, विशेष रूप से बीमा, आवास और बैंकिंग क्षेत्रों में। सूचना के अधिकार और संसदीय जवाबों के जरिये मिले सार्वजनिक डाटा पर आधारित इस रिपोर्ट में पाया गया कि 2025 तक, लगभग आधे राज्य आयोगों और एक-तिहाई जिला आयोगों में कोई मौजूदा अध्यक्ष नहीं था, जबकि 159 स्वीकृत सदस्य पदों में से लगभग 40 प्रतिशत पद खाली थे।
सात राज्य उपभोक्ता आयोगों में सदस्यों के 60 फीसदी पद रिक्त
सात राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों (एससीडीआरसी) मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में सदस्यों के पदों पर 60 फीसदी से अधिक रिक्तियां थीं। इसमें कहा गया कि अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश के एससीडीआरसी में कोई भी सदस्य दर्ज नहीं किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, 20 एससीडीआरसी के उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में से, केवल 10 हरियाणा, केरल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और दिल्ली में ही पिछले पांच वर्षों के दौरान लगातार एक अध्यक्ष रहा। इसमें कहा गया है कि राज्य आयोगों में अध्यक्ष के खाली पदों को लेकर एक बढ़ता हुआ रुझान देखने को मिल रहा है। 2021 में जहां केवल दो एससीडीआरसी बिना अध्यक्ष के काम कर रहे थे, वहीं 2025 तक यह संख्या बढ़कर 10 हो गई।
मामले निपटाने में आंध्र प्रदेश अव्वल
रिपोर्ट में राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर वर्गीकृत किया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उपभोक्ता मामलों के निपटारे में किस राज्य ने बेहतर प्रदर्शन किया, इसकी तुलना निष्पक्ष रूप से हो सके। 19 बड़े और मध्यम आकार के राज्यों में आंध्र प्रदेश ने पहला स्थान हासिल किया, इसके बाद मध्य प्रदेश राजस्थान रहे।
आंध्र प्रदेश में केवल 4.8 प्रतिशत मामले ही तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे राज्यों की श्रेणी में मेघालय शीर्ष स्थान पर रहा। इसके बाद सिक्किम और हिमाचल प्रदेश रहे। इसके विपरीत, तेलंगाना (बड़े राज्यों में 19वें स्थान पर) और मणिपुर (छोटे राज्यों में 9वें स्थान पर) जैसे राज्य क्षमता सूचकांक में सबसे नीचे हैं। बड़े राज्यों में, महाराष्ट्र में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए, लेकिन उसका सीसीआर सबसे कम रहा, क्योंकि 32,382 मामलों में से 65 प्रतिशत मामले अभी भी लंबित हैं।
दिल्ली और सिक्किम में ही थीं महिला अध्यक्ष
लैंगिक विविधता के मामले में रिपोर्ट में पाया गया कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ न्यूनतम वैधानिक जरूरतों को पूरा करने तक ही सीमित रहा। 2024 में यह पाया गया कि 19 राज्य आयोगों में से सिर्फ दिल्ली और सिक्किम में ही महिला अध्यक्ष थीं। कुल सदस्यों और अध्यक्षों में, 2024 में नौ एससीडीआरसी में एक-तिहाई सदस्य महिलाएं थीं जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम द्वारा अनुशंसित 20 प्रतिशत के आंकड़े से अधिक है। वहीं, झारखंड, केरल और हिमाचल प्रदेश में अध्यक्ष या सदस्य के तौर पर एक भी महिला नहीं थी, जो कि वैधानिक निर्देशों का उल्लंघन है।