उच्चतम न्यायालय में बुधवार को एक याचिका दायर की गई जिसमें चुनाव कानून के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के मुताबिक दो वर्ष से ज्यादा की सजा प्राप्त सांसदों-विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया जाता है। याचिका में कहा गया है कि यह ‘स्वेच्छारी’ है क्योंकि दोषी पाए जाने पर नौकरशाहों को बर्खास्त कर दिया जाता है।
भाजपा नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 (3) ‘निरर्थक और असंवैधानिक’ है क्योंकि यह अपराधी विधायकों- सांसदों को अयोग्य ठहराए जाने से बचाती है। वहीं अगर कोई नौकरशाह दोषी ठहराया जाता है तो उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जाता है या जबरन सेवानिवृत्ति दे दी जाती है।
याचिका में कहा गया है, ‘अगर किसी नौकरशाह को दोषी ठहराया जाता है और उसे महज दो दिन कैद की सजा दी जाती है तो भी उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया जाता है। लेकिन जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 (3) सांसदों -विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने से बचाती है... इसलिए यह स्वेच्छारी, अतार्किक और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।’
याचिका में कहा गया है, ‘वर्तमान में 159 सांसदों (29 फीसदी) ने दुष्कर्म, हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े मामलों सहित गंभीर आपराधिक मामले अपने खिलाफ घोषित किए हैं।’ इसमें कहा गया है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद 542 निर्वाचित उम्मीदवारों में से 112 (21 फीसदी) ने खुद के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए थे।