मध्यप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 44.88 प्रतिशत वोट हासिल किया था। वहीं, कांग्रेस को 36.38 तो बसपा को 6.29 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था। इस लिहाज से अगर कांग्रेस बसपा और आदिवासी समूहों में प्रभाव रखने वाले कम्यूनिस्ट पार्टियों के साथ चुनाव लड़ती है तो वह भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश कर सकती है।
ध्यान देने वाली बात है कि कम से कम बसपा को ऐसी पार्टी के रुप में जाना जाता है जो अपना वोट अपने गठबंधन के सहयोगियों तक ट्रांसफर करा सकती है। इस हिसाब से कांग्रेस और बसपा के वोटबैंक एक साथ आ जाते हैं तो भाजपा को कई सीटों पर जीत हासिल करने में मुश्किल हो जाएगी।
शिवराज के लिए और भी हैं मुश्किलें
कांग्रेस के लिहाज से यह बात और भी फायदेमंद है कि किसानों के मुद्दे पर शिवराज सरकार लगातार परेशानी में रही है। मंदसौर की घटना ने किसानों के मन में सरकार के प्रति गु्स्सा पैदा किया है। किसान नेता शिवप्रसाद शर्मा उर्फ कक्का जी इस समय भी सक्रिय हैं और उनके साथ कई शिवराज विरोधी भी सक्रिय हैं। इसके अलावा लंबे भाजपा शासन से उपजी सत्ता विरोधी लहर कांग्रेस की नाव पार लगाने में अहम भूमिका निभा सकती है।