दसॉल्ट एविएशन के सीईओ का यह कहना फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के स्वीकारनामे को बल देता है। राफेल लड़ाकू विमान के सौदे पर आरोप की काली छाया मंडराने के बाद फ्रांस्वा ओलांद ने कहा था कि फ्रांस के पास राफेल लड़ाकू विमान सौदे के लिए ऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस को चुनने के सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं था।
कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने दसॉल्ट एविएशन से मिली इस जानकारी के आधार पर कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष के आरोप बिल्कुल सही हैं। प्रधानमंत्री मोदी देश के नहीं रिलायंस के प्रधानमंत्री हैं। वह पूरे देश के नहीं बल्कि रिलायंस के चौकीदार हैं और रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं।
केंद्र सरकार भले ही गोपनीयता समझौते का उदाहरण देकर राफेल लड़ाकू विमानों की कीमत न बता रही हो, लेकिन यह शर्त रिलायंस डिफेस पर लागू नहीं होती। अनिल धीरू भाई अंबानी की स्वामित्व वाली कंपनी ने फरवरी 2016 में ही इस ऑफसेट करार को ऐतिहासिक और बड़ा करार बताया है। कंपनी ने अपने लेटर हेड पर जारी वक्तव्य में बताया है कि यह 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा 23 सितंबर 2016 को 60 करोड़ रुपये (7.78 अरब यूरो) में हुआ है।
सौदे की पचास फीसदी यानी 30 हजार रुपये की राशि दसॉल्ट रिलायंस एरोस्पेस लिमिटेड के जरिए खर्च होगी। कंपनी ने रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की सहायक कंपनी बताया है। इसमें कहा गया है कि रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने दसॉल्ट एविएशन के साथ मिलकर दसॉल्ट रिलायंस एरोस्पेस लिमिटेड (डीआरएएल) का गठन किया है। इसके चेयरमैन दसॉल्ट एविएशन के चेयरमैन एरिक ट्रेपियर होंगे, जबकि को-चेयरमैन अनिल धीरू भाई अंबानी होंगे।
सुरजेवाला का कहना है कि सरकार कब तक चुप बैठेगी। सुरजेवाला का कहना है कि प्रधानमंत्री इस सौदे पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार झूठ बोल रही हैं, लेकिन यह नहीं चल सकता। प्रधानमंत्री को राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर देश के सामने स्थिति स्पष्ट करनी ही होगी। समझा जा रहा है कि कांग्रेस इस मुद्दे को संसद के मानसून सत्र में सदन का पारा गरम कर सकती है।
सुरजेवाला ने कहा कि सरकार लड़ाकू विमान की कीमत बताने के नाम पर गोपनीयता का हवाला दे रही है, लेकिन यह बात रिलायंस जैसी कंपनी पर लागू नहीं होती। क्योंकि इसकी चौकीदारी खुद प्रधानमंत्री कर रहे हैं।