श्वेतपत्र पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने केंद्र सरकार के इरादों पर सवाल उठाया। बहस में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस सदस्य मनीष तिवारी ने कहा, लोकसभा चुनाव से पहले आए श्वेतपत्र की टाइमिंग से साफ है कि यह एक ‘राजनीतिक घोषणापत्र’ है। लेकिन बता दूं कि यूपीए ने सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार और मनरेगा जैसे अधिनियम बनाए। जिनसे देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नींव को मजबूत किया।
तिवारी ने कहा, अगर सरकार की मंशा साफ है तो उसे 2014 में श्वेतपत्र लाना चाहिए था। यूपीए सरकार की पहल के कारण 130 करोड़ लोगों को सूचना का अधिकार मिला। दुर्भाग्य से, 2014 से 2024 तक, आरटीआई को खत्म कर दिया गया है। हमारी दूसरी उपलब्धि मनरेगा है। 2005 में जब यह आया था तब से 100 दिन का प्रावधान है। मैं पूछता हूं आप इसे 101 दिन भी नहीं कर पाए। कांग्रेस के ही अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि श्वेतपत्र मनगढ़ंत बातों और झूठ का पहाड़ है। इसे पेश करने का उद्देश्य सिर्फ चुनावी फायदा कमाना है। उन्होंने कहा, भाजपा विनियोग, भ्रष्टाचार और आत्ममुग्धता की राजनीति में लिप्त है। सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘रोम एक दिन में नहीं बना था।’ सत्ता पक्ष इतिहास को नजरअंदाज न करे। तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय ने कहा, वित्त मंत्री को सबसे पहले नोटबंदी के लिए 'माफी' मांगनी चाहिए। रॉय ने कहा कि खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ बताने वाली सरकार से मैं पूछता हूं कि नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और विजय माल्या कहां हैं।