कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति लंबे समय से राज्यों के एक हजार के करीब मतदाताओं की सूची को अंतिम रूप देने में जुटी है जो नए अध्यक्ष को चुनेंगे। चुनाव कब तक हो जाएंगे ये जवाब अभी तक चुनाव समिति के पास नहीं है, बस चुनाव प्रक्रिया चल रही है।
जबकि राहुल गांधी के विदेश से लौटने पर ही साफ होगा कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा। राहुल समर्थक 99.9 प्रतिशत उन्हीं के अध्यक्ष पद संभालने का दावा कर रहे हैं लेकिन सौ प्रतिशत का फैसला राहुल पर निर्भर करता है।
राहुल गांधी विदेश से लौटने पर सात जनवरी से पार्टी के विभिन्न प्रतिनिधि मंडलों से मुलाकात करेंगे। ऐसा माना जा रहा है पार्टी के नेता उनकी मनुहार कर पुन: पद संभालने की पेशकश करेंगे। उम्मीद है कि सहमति बनी तो कांग्रेस कार्यसमिति ही उन्हें अध्यक्ष चुन लेगी। उसके बाद कांग्रेस अधिवेशन बुलाकर राज्यों से चुने गए एआईसीसी के प्रतिनिधि उस पर अपनी मुहर लगा देंगे। इससे चुनाव की प्रक्रिया नहीं करनी पडे़गी।
राहुल गांधी के अध्यक्ष पद पर करीब 15 महीने और बीते 16 महीनों से कार्यकारी अध्यक्ष के बाद जो भी अध्यक्ष होगा अधिक से अधिक एक साल का शेष कार्यकाल मिलेगा। ऐसे में इस बात की भी संभावना बढ़ गई है कि पार्टी फिलहाल चुनाव कराकर किसी अन्य नेता को अध्यक्ष बना दे और अगले साल तक राहुल गांधी को इसके लिए तैयार कर ले। जबकि राहुल के करीबियों का कहना है कि राहुल गांधी को ही अध्यक्ष पद के लिए तैयार करेंगे। साथ ही आने वाले महीनों में राजस्थान में एक या दो दिन का अधिवेशन बुलाकर उस पर पार्टी की मुहर लगवाई जा सकती है।
यूपीए चेयरमैन को लेकर कांग्रेस और शिवसेना में बढ़ी तकरार
वहीं, यूपीए चेयरमैन को लेकर कांग्रेस और शिवसेना में तकरार बढ़ गई है। शरद पवार को यूपीए अध्यक्ष बनाने के शिवसेना के प्रस्ताव पर ज्यादातर विपक्षी दल सहमत हैं। उन्हें इससे यूपीए का कुनबा बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, कांग्रेस को अपना अधिकार छिनता दिख रहा है। इस पर कांग्रेस और शिवसेना के नेताओं में जुबानी जंग छिड़ गई है।
यूपीए में सबसे बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस अध्यक्ष इसका चेयरमैन होता है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी अस्वस्थ हैं और ऐसे में यदि राहुल गांधी अध्यक्ष बनते हैं तो यूपीए के अधिकतर घटक दल उनके नेतृत्व में असहज महसूस करेंगे।
इसीलिए उनको लगता है कि पवार के यूपीए अध्यक्ष बनने से न सिर्फ यूपीए मजबूत होगा, बल्कि उसमें तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना जैसी दूसरी पार्टियां भी शामिल हो सकती हैं। भाजपा से अलग होकर शिवसेना भी एक ऐसा प्लेटफार्म तलाश रही है।