राजनीतिक जानकारों का कहना है कि दिल्ली में एक तरह से सुषुप्तावस्था में पड़ी कांग्रेस ने सातों सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ने की तैयारी के साथ आम आदमी पार्टी को खुले आम चुनौती दे दी है कि दिल्ली में उनकी दावेदारी सातों सीटों पर होने जा रही है। साथ ही साथ पार्टी ने गठबंधन में शामिल उन सभी दलों को भी यह संदेश दिया है कि उनकी पार्टी को पुरानी परिस्थितियों को देखते हुए कोई भी राजनीतिक दल किसी अन्य राज्य में भी कम सीट देने की बात न करे।
कांग्रेस पार्टी की ओर से बुधवार को दिल्ली में अपने कार्यकर्ताओं को मजबूती से लोकसभा चुनावों में लड़ने और संगठन को मजबूत करने के लिए बड़ी बैठक का आयोजन किया गया। दिल्ली में बुधवार को जब यह बैठक शुरू हुई तो सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की होने लगी कि कांग्रेस पार्टी आने वाले दिनों में दिल्ली में अपनी मजबूत स्थिति की तैयारियों का जायजा लेने लेने और मजबूती से लोकसभा चुनाव की तैयारी करने के निर्देश के साथ आम आदमी पार्टी को सभी सातों सीटों पर न लड़ने देने के लिए बड़ा दांव चल दिया है।
कांग्रेस की नेता अलका लांबा ने बताया कि उनकी पार्टी के नेताओं ने दिल्ली में सभी सातों सीटों पर आगामी लोकसभा चुनावों में मजबूती से तैयारी करने के लिए कहा है। अलका लांबा कहती है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सभी सातों सीटों पर दूसरे नंबर पर थी इसलिए उनके नेताओं को भरोसा है कि वह कार्यकर्ताओं की मेहनत के साथ इस बार दिल्ली में बड़ी सीटें जीत सकेंगे। अलका लांबा के इस बयान के साथ ही सियासी सरगर्मियों का दौर भी शुरू हो गया।
राजनीतिक विश्लेषक देवेंद्र उपाध्याय कहते हैं कि विपक्षी दलों को एकजुट करने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बुधवार को दिल्ली में है। उनकी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात भी तय है। नीतीश कुमार लगातार यह कहते आए थे कि बगैर कांग्रेस के किसी भी विपक्ष के गठबंधन का कोई अस्तित्व नहीं हो सकता है। नितीश कुमार कांग्रेस की हमेशा से विपक्ष में शामिल होने की पैरवी करते आए थे। अब जब उनकी शहर में उपस्थिति वाले दिन कांग्रेस के बड़े नेता दिल्ली की सभी सातों सीटों पर अपने कार्यकर्ताओं को मजबूती से चुनाव लड़ने की तैयारी करने को कहते हैं तो समझ आता है कि कांग्रेस ने किस तरह से पॉलीटिकल प्रेशर का बटन दबाया है।
उनका मानना है जिस तरीके से अलका लांबा के बयान के बाद आम आदमी पार्टी के नेता का बयान आया है उसे यही लगता है कि इस मुद्दे को अब INDIA के फोरम पर रखा जाएगा। क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री और गठबंधन को एक नई दिशा देने वाले नीतीश कुमार के साथ अरविंद केजरीवाल की बैठक प्रस्तावित है। सियासी गलियारों में अनुमान यही लगाया जा रहा है कि उस दौरान कांग्रेस की आक्रामकता और सभी सातों सीटों पर चुनाव लड़ने के बयान आने के बाद दिल्ली में किसी भी सियासी उथल-पुथल को रोकने की कवायद का भी जिक्र हो सकता है।
सियासी जानकारों का कहना है कि कांग्रेस की इस बैठक से आम आदमी पार्टी को निश्चित तौर पर एक तरह से दबाव में लेने की कोशिश भी की है और एक संदेश भी दिया है कि वह सातों सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषक आनंद जुनेजा कहते हैं कि सियासत में टाइमिंग हमेशा से बहुत मायने रखती है। इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि नीतीश कुमार के दिल्ली में रहते हुए कांग्रेस ने एक तरह से बिहार में भी सीटों के बंटवारे का एक तरह से संदेश दे दिया है।
वह कहते हैं कि जिस तरीके से कांग्रेस दिल्ली में सुसुप्तावस्था में पड़ी हुई है लेकिन अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ बैठक कर सक्रिय मोड में आने की कवायद करती है जिससे निश्चित तौर पर एक सियासी संदेश जाता है। वह कहते हैं खास तौर से दिल्ली में तो इसके मायने निश्चित तौर पर इसलिए भी निकाले जाएंगे क्योंकि 2019 के चुनावों में सभी सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी। सियासी गलियारों में चर्चा यह हो रही थी कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है इसलिए अगर INDIA गठबंधन के तहत कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो दिल्ली में उनको सीट मिलने की संभावनाएं ना के बराबर थी। ऐसे में कांग्रेस की बुधवार को ही बैठक पार्टी के लिए एक बड़ी बूस्टर डोज के तौर पर भी देखी जा रही है।
हालांकि, कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि बुधवार को हुई दिल्ली के नेताओं की बैठक के साथ पार्टी न सिर्फ दिल्ली बल्कि उन राज्यों में भी अपने संगठन को और मजबूती से आगे बढ़ाएगी जहां अभी पार्टी कमजोर है। बुधवार को दिल्ली में आयोजित हुई बैठक में शामिल पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि सीटों का बंटवारा तो गठबंधन की बैठकों में तय होगा। लेकिन पार्टी अपनी ओर से कोई कोर कसर नहीं छोड़ने वाली है।
उक्त कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता तो यह तक कहते हैं कि उनको आज की परिस्थिति के मुताबिक अलग-अलग राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकार चलाने वाले गठबंधन में शामिल दलों को उनको कम सीटें देने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनका कहना है कि दिल्ली में भले कांग्रेस इतनी मजबूत ना हो लेकिन लोकसभा के चुनाव में उनके सातों प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे इसलिए उनकी दावेदारी भी सबसे मजबूत है। अन्य राज्यों में भी कांग्रेस कमजोर जरूर है, लेकिन उस कमजोरी का लाभ उठाकर उनको कम सीटें नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि उनका संगठन सभी मजबूती के साथ चुनावी तैयारी में लग गया है। इसलिए उनके कार्यकर्ताओं की मेहनत के आधार पर ही सीटों का बंटवारा होगा तो पार्टी को सियासी फायदा मिलेगा।