लुटियंस दिल्ली के सबसे चर्चित पते '24 अकबर रोड' पर इन दिनों सन्नाटा तो है, लेकिन यह सन्नाटा किसी बड़े तूफान से पहले की शांति जैसा लग रहा है। पिछले कई दशकों से देश की सियासत का केंद्र रहे इस बंगले को खाली करने के लिए केंद्र सरकार के संपदा विभाग ने 28 मार्च की समयसीमा तय की थी। लेकिन, कांग्रेस के गलियारों से छनकर आ रही खबरों की मानें तो, फिलहाल 'हाथ' के इस पुराने ठिकाने पर ताला लटकने की संभावना कम ही है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, संपदा विभाग का तर्क है कि कांग्रेस ने कोटला रोड पर अपने नए मुख्यालय 'इंदिरा भवन' का निर्माण पूरा कर लिया है। पिछले साल इसका उद्घाटन भी हो चुका है, इसलिए नियमों के मुताबिक अब इन सरकारी बंगलों पर पार्टी का कोई हक नहीं बनता। 25 मार्च को जारी किए गए अंतिम नोटिस में साफ कहा गया था कि 28 मार्च तक परिसर खाली कर दिया जाए।
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पर्दे के पीछे की रणनीति
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी इस बेदखली को टालने के लिए त्रि-स्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के कानूनी दिग्गज इस नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर चुके हैं। दलील यह है कि 1978 से चल रहे इतने बड़े कार्यालय को खाली करने के लिए महज 72 घंटे का समय देना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। दशकों के रिकॉर्ड, फाइलें और लाइब्रेरी को शिफ्ट करने के लिए कम से कम 3 से 6 महीने का समय मांगा जा सकता है।
इसके इतर, कांग्रेस के भीतर यह चर्चा है कि जब भारतीय जनता पार्टी ने अपना नया मुख्यालय बनने के बाद भी 11 अशोक रोड वाले पुराने दफ्तर को लंबे समय तक अपने पास रखा था, तो कांग्रेस के साथ अलग व्यवहार क्यों? सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस का एक बैकअप प्लान यह भी है कि इन बंगलों को राज्यसभा के वरिष्ठ सांसदों के नाम पर आवंटित करा लिया जाए, जिससे तकनीकी तौर पर बेदखली की कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली जाएगी। हालांकि, अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि कांग्रेस किस प्लान से आगे बढ़ेगी।
कांग्रेस के लिए धरोहर है '24 अकबर रोड'
24 अकबर रोड केवल इमारत नहीं है, बल्कि कांग्रेस के लिए एक धरोहर है। इमरजेंसी के बाद पार्टी की वापसी से लेकर सोनिया गांधी के लंबे कार्यकाल तक, इसी परिसर ने इतिहास बनते देखा है। ऐसे में पूरी संभावना है कि 28 मार्च की डेडलाइन को कुछ हफ्तों या महीनों के लिए आगे खिसका दिया जाए, जिससे प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।