16 अप्रैल के बाद कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सासंद राहुल गांधी प्रेस वार्ता के माध्यम से फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए आगे आए हैं। राहुल गांधी की रणनीति प्रधानमंत्री की भाषा में उन्हें घेरने है।
केंद्र सरकार से 45 दिन के लॉकडाउन के बाद देश का हर वर्ग पैकेज के बहाने राहत मांग रहा है। एमएसएमई के साथ-साथ दुकानदारों, कारोबारियों, कामगारों, परिवहन समेत अन्य क्षेत्र से जुड़े लोगों ने भी आर्थिक राहत की मांग तेज कर दी है।
एमएसएमई मंत्री नितिन गडकरी इसके बाबत पिछले सप्ताह से कई बार लोगों को भरोसा दिला चुके हैं। ब्रिटानिया जैसी बिस्किट बनाने वाली कंपनी का कहना है कि वह प्रोडक्शन शुरू करना चाहती है, लेकिन बाजार में मांग नहीं है। यही एमएसएमई सेक्टर भी कह रहा है।
दूसरे गरीब, मजदूरों के पलायन से कारोबारी, औद्योगिक गतिविधियों, शहरी जीवन को बड़ा झटका लगना तय माना जा रहा है। सीआईआई नार्थ इंडिया के चेयरमैन दिनेश दुआ का कहना है कि भ्रम काफी बढ़ गया है।
दुआ कहते हैं कि बिना सरकार के ठोस आर्थिक राहत पैकेज के आर्थिक गतिविधियों का रास्ते पर आना संभव नहीं है। वहीं सरकार के रणनीतिकार कोविड-19 की लड़ाई को काफी लंबी मानकर चल रहे हैं। एम्स के निदेशक डा. रणदीप गुलेरिया का कहना है कि जून-जुलाई में कोविड-19 की सबसे खराब तस्वीर भारत में आ सकती है।
केंद्र सरकार को पहला झटका कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सकारात्मक पहल से लगा। सोनिया गांधी ने पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, राहुल गांधी और अन्य की सलाह पर गरीब मजदूरों के रेल के किराए को पार्टी द्वारा भरने का निर्णय ले लिया।
रातों रात कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष की तरफ से राज्य मुख्य सचिव को एक करोड़ रुपये का चेक भिजवा दिया। सुबह होते ही कांग्रेस महासचिव (संगठन) के सी वेणुगोपाल ने सभी प्रदेश अध्यक्षों से बात करके गरीब, मजदूरों के रेल का किराया देने का कांग्रेस अध्यक्ष का निर्णय सुना दिया।
सोनिया गांधी का यह सकारात्मक संदेश केंद्र सरकार के मर्म पर चोट कर गया था। भाजपा और केंद्र सरकार के रणनीतिकारों ने भी गहरे तक महसूस किया। रेलमंत्री पीयूष गोयल और केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर रक्षात्मक रहना पड़ा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोविड-19 संक्रमण को लेकर अब तक चार बार राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मशविरा कर चुके हैं। राज्यों ने हर बार प्रधानमंत्री से अपने बकाया जीएसटी के भुगतान, आर्थिक मदद, केंद्रीय स्तर से चिकित्सा, जांच के संसाधन की मांग की और अभी तक राज्यों के मुख्यमंत्री की किसी न किसी रूप में मांग बनी हुई है।
दूसरी बार की मंत्रणा से ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अप्रवासी मजदूरों, गरीबों का मुद्दा उठाना शुरू किया है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों के आपसी समन्वय से प्रवासी मजदूरों के आने-जाने का प्रोटोकॉल बनने के बाद बने दबाव में केंद्र सरकार को भी इसमें रेल सेवा की सहायता के लिए उतरना पड़ा।
लेकिन मजदूरों की बड़ी संख्या, शहरी तथा औद्योगिक भारत की लाइफलाइन (कामगार) होने के कारण न केवल कई राज्य दो कदम आगे, ढाई कदम पीछे की रणनीति पर चल रहे हैं। एमएसएमई की दशा लगातार खराब हो रही है। वह अपने कामगारों (11 करोड़) को तनख्वाह देने की स्थिति में नहीं है।
सरकार के पास लॉकडॉउन से बाहर आने की कोई सधी रणनीति लोगों की भी समझ में कम आ रही है। सरकार की इस हां और ना में उलझी स्थिति को केंद्र में रखकर राहुल गांधी ने विशेषज्ञों से बात करके अपना सुझाव सामने रखा है। राहुल इस बहाने कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री को सब कुछ तय करने की आदत छोड़नी चाहिए।
राहुल गांधी का सकारात्मक सहयोग देने की आड़ में यह बड़ा हमला है। वह इसे प्रधानमंत्री की आदत बताते हैं। दूसरी प्रेस वार्ता, रघुराम राजन से बातचीत, अभिजीत बनर्जी से बातचीत में भी राहुल गांधी ने विशेषज्ञों के हवाले यही संदेश देने की कोशिश की।
उन्होंने शुक्रवार को भी प्रेसवार्ता में सबसे ज्यादा जोर केंद्रीयकरण से विकेन्द्रीकरण पर दिया। राहुल गांधी ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री राज्यों के हालात के बारे में अधिक जानते हैं। देश के जिलों के जिलाधिकारी जिलों के बारे में अधिक जानते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इन्हें कोई तवज्जो नहीं देता।
पीएमओ खुद देश में कोविड-19 को लेकर रेड, आरेंज, ग्रीन जोन बना रहा है। इससे न सप्लाई चेन बन पा रही है और न ही देश की लॉकडाउन से बाहर आने की रणनीति दिशा ले पा रही है। इसके कारण औद्योगिक, कारोबारी गतिविधियां भी उलझ जा रही हैं।
परोक्ष रूप से राहुल गांधी का आरोप है कि प्रधानमंत्री दिखावे के लिए सबसे चर्चा करते हैं, लेकिन सब कुछ पीएमओ तय करता है। मुख्यमंत्रियों को सहयोगी के तौर पर देखा नहीं जाता। इसलिए समस्या बढ़ रही है।
याद कीजिए। गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले का समय। राहुल गांधी ने सूरत के व्यापारियों से कहा था डरो मत। गुजरात के कारोबारियों से कहा था, डरो मत। बाद में वह राष्ट्रीय स्तर पर डरो मत कहते नजर आए।
राहुल गांधी ने एक बार फिर देश में कोविड-19 को लेकर फैले डर के माहौल पर हमला कर रहे हैं। शुक्रवार की प्रेस वार्ता में उन्होंने इसे केंद्र सरकार की रणनीति के साथ जोड़ा। राहुल ने कहा कि कोविड-19 केवल 1-2 फीसदी डायबिटीज आदि से पीड़ित लोगों की जान लेने वाली बीमारी है।
इसको लेकर 99-98 फीसदी में डर बैठाकर सब कुछ ठप कर देना रणनीतिक समझ की कमी है। राहुल साफ कह रहे हैं कि कोविड-19 के संक्रमण से सावधान रहिए, सुरक्षित रहिए, लेकिन इतना मत डरिए।
समझा जा रहा है कि वह आने वाले समय में केंद्र सरकार के लॉकडाउन पर बड़ा सवाल उठाएंगे। 45 दिन के लॉकडाउन पर जिस तरह से उन्होंने निशाना साधा है, उससे साफ है कि सरकार ने इस दौरान लॉकडाउन का फायदा नहीं उठाया। बिना ठोस रणनीति के लागू किया लॉकडाउन अब देश पर बोझ की तरह है।