'सामना' में कहा गया, बीते आठ साल में सत्ता में होने के बावजूद भाजपा ने सावरकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित नहीं किया, यह मांग वर्षों से हो रही है। जब भी सावरकर को 'भारत रत्न' की मांग उठती है तो भाजपा अपना चेहरा छुपा लेती है।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने विनायक दामोदर सावरकर (वीडी सावरकर) के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा की भिड़त की आलोचना की है। इसने कहा कि इन दोनों दलों ने सावरकर के मुद्दे को महत्वहीन बना दिया है। पार्टी ने कहा कि दोनों पक्षों को सावरकर के राजनीतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और आर्थिक विचारों का अध्ययन करने की आवश्यकता है।
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कहां से शुरू हुआ विवाद?
दरअसल, पिछले सप्ताह कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान दावा किया था कि सावरकर को अंग्रेजों से पेंशन मिलती थी और यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। इस पर महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राहुल गांधी, भारत और उनकी पार्टी के इतिहास को नहीं जानते हैं। फडणवीस ने उद्धव ठाकरे पर भी निशाना साधते हुए पूछा था कि क्या शिवसेना नेता सावरकर के खिलाफ इस तरह के बयान का समर्थन करते हैं?
'पहले सावरकर के विचारों का अध्ययन करें दोनों दल'
ठाकरे नेतृत्व वाली शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में कहा कि कांग्रेस और भाजपा ने सावरकर के मुद्दे को महत्वहीन बताया है। हिंदुत्व के विचार सावरकर आधुनिक भारतीय इतिहास के एक 'हाई-पोलाराइज फिगर' हैं। वह शिवसेना और भाजपा, दोनों के लिए एक सम्मानित व्यक्ति हैं। दोनों पक्षों को पहले सावरक के राजनीतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और आर्थिक विचारों का अध्ययन करना चाहिए।
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सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ने नहीं दिया 'भारत रत्न'
'सामना' में कहा गया, बीते आठ साल में सत्ता में होने के बावजूद भाजपा ने सावरकर को 'भारत रत्न' से सम्मानित नहीं किया, यह मांग वर्षों से हो रही है। 'सामना' में कहा गया है कि जब भी सावरकर को 'भारत रत्न' की मांग उठती है तो भाजपा अपना चेहरा छुपा लेती है। सिर्फ अफवाह है कि सावरकर भाजपा का मुद्दा है।
'सावरकर जैसे क्रांतिकारियों से हैरान रह गए थे अंग्रेज'
पार्टी के मुखपत्र में आगे यह यह भी पूछा गया है कि मोदी सरकार ने सावरकर के नाम पर राजपथ का नामकरण क्यों नहीं किया। राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्यपथ कर दिया गया है। संपादकीय में कहा गया है कि कांग्रेस वर्षों से दावा करती रही है कि सावरकर अपनी दया याचिका के बाद ही अंडमान की जेल से बाहर आए। स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों की भूमिकाके बारे में कांग्रेस की अलग सोच हो सकती है, लेकिन सावरकर जैसे कई क्रांतिकारियों के विद्रोह से अंग्रेज हैरान रह गए थे।