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गुजरात चुनाव बता देगा कि कांग्रेस के 'विपक्षी एकता' के दावे में कितना दम?

Fri, 12 May 2017 08:53 AM IST
amarujala.com- Presented by: पवन नाहर
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सोनिया गांधी और राहुल गांधी (कांग्रेस) - फोटो : AP
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2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के अजेय रथ को रोकने के लिए सोनिया गांधी एंटी-बीजेपी गठबंधन की तैयारी कर रहीं हैं। मगर इस पूरे जोड़-तोड़ में उनकी अपनी ही पार्टी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात में कड़ी चुनौती से जूझना पड़ेगा। गुजरात में इस साल दिसंबर में लोकसभा चुनाव होने हैं।
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इन चुनावों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) औऱ हार्दिक पटेल ने एक तरीके से तीसरा मोर्चा खोल कर कांग्रेस नेतृत्व के सामने एनडीए के खिलाफ एकजुट होने की चुनौती रख दी है। गैर-भाजपा खेमे में कईयों का मानना है कि यदि पार्टियां राष्ट्रपति चुनवाों में भाजपा के खिलाफ खड़ी होने की कोशिश करती भी हैं, तो इनकी इन चुनावों में इनकी एकजु़टता पर सवालियानिशान खड़े हो जाएंगे।

गुजरात चुनावों की तस्वीर तब सामने आने लगी जब विपक्ष के नेताओँ ने महात्मा गांधी के पोते गोपालकृष्ण गांधी के साथ अनौपचारिक बातचीत शुरू की। इसके बाद एनसीपी-जेडीयू कैंप ने वोटों के बंटवारे को रोकने की जिम्मेदारी कांग्रेस को दी है। ऐसे में गुजरात चुनावों के दौरान कांग्रेस के सामने दो मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। जहां, एनसीपी-जेडीयू-पटेल के मोर्चे से कांग्रेस को और नुकसान होगा, वहीं पार्टी पिछले करीब 25 सालों के बीजेपी को हराने में नाकाम रही है।
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क्षेत्रीय पार्टियों को अपने साथ जोड़ रही है भाजपा

नरेंद्र मोदी- लाल कृष्ण आडवाणी
तीसरे मोर्च के एक बड़े नेता का मानना है कि कांग्रेस न सिर्फ पिछले 25 सालों में फेल हुई है, बल्कि उसके शीर्ष नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। अगर कांग्रेस गुजरात में बीजेपी को हराना चाहती है तो उसे जेडीयू-पटेल-एनसीपी मोर्चे के अलावा दलित नेता जिगनेश और अति पिछड़े वर्ग के नेता कलपेश ठाकुर को भी अपने साथ लेना होगा।

साथ ही जिस तरह भाजपा ने उत्तर प्रदेश चुनावों के दौरान अपनी लहर में छोटी पार्टियों को दरकिनार नहीं किया, उसी तरह वह गुजरात में भी ऐसा ही कर सकती है। इसका असर उसे विधानसभा चुनावों में दिखे या न दिखे, मगर लोकसभा चुनावों में जरूर दिखाई देता है।

जहां एक तरफ भाजपा जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक, क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़ने में लगी है। ऐसे में गुजरात के बाद राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का उद्भव और लहर की काट खोज पाना मुश्किल है। इस वक्त बाकी दलों को अपनी अंदर झांककर शीर्ष नेतृत्व की सुधारना चाहिए।
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