प्रसिद्ध किसान नेता चौधरी छोटूराम ने कभी कहा था कि जब किसान सरकार से नाराज होता है तो वह सरकारें बदल देता है। चौधरी छोटूराम के इन शब्दों के आलोक में देखें तो 26 नवंबर से चल रहे किसान आंदोलन का निष्कर्ष भी इसी तरह के परिणाम में तब्दील हो सकता है। यह अनुमान बेवजह नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक तरफ जहां किसानों के आंदोलन, सम्मेलन, महापंचायत में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है, तो वहीं सत्तापक्ष के कई नेताओं को कुछ इलाकों में प्रवेश तक नहीं करने दिया जा रहा है। किसान आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक सत्तापक्ष पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा कार्यक्रम करने की हिम्मत नहीं जुटा सका है।
पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में आंदोलन बहुत तेजी से सक्रिय है। माना जा रहा है कि इन राज्यों में इसका व्यापक असर पड़ सकता है। चूंकि इनमें पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में फरवरी मार्च 2022 में चुनाव हैं जो अब सबसे नजदीक हैं, और यहीं के किसान आंदोलन में सबसे प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, माना जा रहा है कि इसका सबसे व्यापक असर इन्हीं राज्यों में देखने को मिल सकता है, तो हरियाणा में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान में भी आंदोलन का कुछ असर दिख रहा है और यहां भी इसका कुछ राजनीतिक असर पड़ सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की सक्रियता भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
भाजपा नेता सुदेश वर्मा ने कहा कि कुछ लोगों को गलतफहमी है कि इस तरह किसानों की आड़ में छिपकर वे भाजपा या नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं, तो वे जल्दी ही गलत साबित हो जाएंगे। केंद्र सरकार ने किसानों के लिए काफी काम किया है। उनका कहना है कि इसी प्रकार की कोशिश पिछली सरकार के दौरान भी दलित आंदोलन खड़ा करके की गई थी, लेकिन जनता ने सच का साथ दिया। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि इस बार भी मोदी सरकार के प्रति लोगों का भरोसा बना रहेगा।