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किसान आंदोलन की आंधी में किस राजनीतिक दल की टोकरी में कितने 'आम' गिरेंगे, सबको है इंतजार!

Tue, 16 Feb 2021 06:32 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में आंदोलन बहुत तेजी से सक्रिय है। माना जा रहा है कि इन राज्यों में इसका व्यापक असर पड़ सकता है...
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Priyanka Gandhi addressing the kisan Mahapanchayat at Bijnor - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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प्रसिद्ध किसान नेता चौधरी छोटूराम ने कभी कहा था कि जब किसान सरकार से नाराज होता है तो वह  सरकारें बदल देता है। चौधरी छोटूराम के इन शब्दों के आलोक में देखें तो 26 नवंबर से चल रहे किसान आंदोलन का निष्कर्ष भी इसी तरह के परिणाम में तब्दील हो सकता है। यह अनुमान बेवजह नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक तरफ जहां किसानों के आंदोलन, सम्मेलन, महापंचायत में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है, तो वहीं सत्तापक्ष के कई नेताओं को कुछ इलाकों में प्रवेश तक नहीं करने दिया जा रहा है। किसान आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक सत्तापक्ष पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा कार्यक्रम करने की हिम्मत नहीं जुटा सका है।

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ये इशारे इंगित कर रहे हैं कि जनमानस में किसान आंदोलन ने एक बड़े बदलाव की नींव रख दी है। तमाम राजनीतिक दल इस बदलाव को बखूबी भांप रहे हैं और यही कारण है कि कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष किसानों के साथ आ खड़ा हुआ है। प्रियंका गांधी लगातार सक्रिय हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक इलाकों में महापंचायत कर चुकी हैं तो आरएलडी भी अपना पूरा दमखम लगा रही है। आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। ऐसे में यह सवाल जरूर पूछा जाने लगा है कि किसान आंदोलन की आंधी में किस दल के हिस्से में क्या आएगा।

किसान नेता अवीक साहा ने अमर उजाला से कहा कि उनका आंदोलन पूरी तरह गैर-राजनीतिक रहा है। आगे भी उनका आंदोलन गैर-राजनीतिक ही रहेगा। लेकिन कोई भी किसानों के साथ खड़ा होकर अपना समर्थन जरूर दे सकता है। उनका पूरा सरोकार केवल किसान मुद्दे से है और वे केवल उसे ही समर्थन देने की बात करेंगे जो किसानों के हितों की चिंता करने वाला हो। साहा ने साफ किया कि वे वर्तमान सरकार से भी किसी तरह की नाराजगी नहीं रखते हैं। सरकार के साथ उनका मतभेद केवल कानूनों को लेकर है। अगर सरकार आज भी कृषि कानूनों की वापसी की गारंटी दे, तो किसानों की उससे नाराजगी दूर हो सकती है।
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वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता अभिमन्यु त्यागी ने कहा कि जनता इस बात को बखूबी परख रही है कि वे चेहरे कौन से हैं जो इस आंदोलन की घड़ी में उसके साथ खड़े हैं और कौन लोग हैं जो उन्हें खालिस्तानी-पाकिस्तानी बता रहे हैं। किसानों के पास कानून बदलने की ताकत भले ही न हो, उसके पास सरकार बदलने की ताकत जरूर है और वह अपनी इस ताकत का इस्तेमाल अगले चुनाव में जरूर करेगा।

यहां तेजी से बदलेंगे समीकरण

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में आंदोलन बहुत तेजी से सक्रिय है। माना जा रहा है कि इन राज्यों में इसका व्यापक असर पड़ सकता है। चूंकि इनमें पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में फरवरी मार्च 2022 में चुनाव हैं जो अब सबसे नजदीक हैं, और यहीं के किसान आंदोलन में सबसे प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, माना जा रहा है कि इसका सबसे व्यापक असर इन्हीं राज्यों में देखने को मिल सकता है, तो हरियाणा में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान में भी आंदोलन का कुछ असर दिख रहा है और यहां भी इसका कुछ राजनीतिक असर पड़ सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की सक्रियता भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

भाजपा का दावा, नहीं पड़ेगा असर

भाजपा नेता सुदेश वर्मा ने कहा कि कुछ लोगों को गलतफहमी है कि इस तरह किसानों की आड़ में छिपकर वे भाजपा या नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं, तो वे जल्दी ही गलत साबित हो जाएंगे। केंद्र सरकार ने किसानों के लिए काफी काम किया है। उनका कहना है कि इसी प्रकार की कोशिश पिछली सरकार के दौरान भी दलित आंदोलन खड़ा करके की गई थी, लेकिन जनता ने सच का साथ दिया। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि इस बार भी मोदी सरकार के प्रति लोगों का भरोसा बना रहेगा।

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