रेगिस्तान की भीषण गर्मी
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कहा जाता है कि जब सिर पर कुछ कर गुजरने का जुनून सवार हो तो साजो-समान की कोई जरूरत ही नहीं है। दही-प्याज का नुस्खा वैसे तो पुराना हो गया है, लेकिन कुछ जवान इसे आज भी आजमाते हैं। कुछ जवान गुड़ और चना अपने पास रखते हैं। गर्मी से बचने के लिए वो सिर पर मोटे कपड़े का पटका बांधे रखते हैं, ताकि चेहरा और सिर, दोनों लू से बचे रहें।
आप यह जानकार हैरान होंगे कि कई बार एक जवान को 17 घंटे तक भी गश्त पर रहना पड़ता है। गश्त के दौरान पानी की बोतल साथ होती है। धूल भरी गर्म हवाओं से आंखों का बचाव करने के लिए जवानों को चश्मा उपलब्ध कराया गया है। रात को एक बजे के आसपास जब रेगिस्तान का तापमान करीब 20 डिग्री नीचे चला जाता है और ठंडी हवाएं चलने लगती हैं, तब ही ये जवान नींद ले पाते हैं।
बता दें कि जवानों को अगर थोड़ी बहुत देर के लिए छांव में खड़े होना हो तो वे बेर और खेजड़ी जैसे पेड़ों का सहारा लेते हैं। हालांकि इनकी छांव गहरी नहीं होती, लेकिन जवान को सूरज की सीधी किरणों से बचाती है। ये पेड़ भी खुद बीएसएफ जवानों ने ही लगाए हैं।
चिलचिलाती गर्मी में गश्त करते जवान
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पेट्रोलिंग के रास्ते पर जवानों को अपने लिए भले ही कुछ न मिले, लेकिन उन्होंने बेजुबान परिंदों और गायों के खाना-पानी का इंतजाम कर रखा है। कई जगहों पर पेड़ की छांव में परिंदों और गायों के लिए पानी भरकर रख दिया जाता है। खाना-पानी की तलाश में सीमा पार के परिंदे भी बीएसएफ वालों के आसपास आ जाते हैं। यूं कहिए कि अब वे बीएसएफ के दोस्त बन गए हैं। बीएसएफ के जवान जब सीमा पर गश्त करते हैं तो वे सीमा पार से आए परिंदे जवानों के कंधों पर बैठ जाते हैं। जवान तुरंत समझ जाते हैं और वे उन्हें पानी पिलाते हैं। कुछ दाना डाल देते हैं। गुड़ चना भी खिलाते हैं। इन परिंदों को यह मालूम होता है कि जवान कितने बजे किस प्वाइंट पर पहुंचेंगे। वे ठीक उसी वक्त वहां चले आते हैं।