ब्लैक कार्बन जलवायु परिवर्तन को तेज करने और मौसम की चरम घटनाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह ग्लेशियरों के पिघलने और मानसून प्रणाली में गंभीर व्यवधान का कारण बन रहा है। यह विशेष रूप से दक्षिण एशिया और हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में प्रभाव डाल रहा है, जिससे बाढ़ और खाद्य सुरक्षा संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
ब्लैक कार्बन एक अल्पकालिक लेकिन अत्यंत खतरनाक जलवायु प्रदूषक है, जिसे वैश्विक तापमान वृद्धि के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार माना जाता है। यह केवल ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का कारण ही नहीं बन रहा बल्कि मानसूनी प्रणाली में भी गंभीर व्यवधान उत्पन्न कर रहा है।
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इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमडी) और क्लीन एयर फंड के ताजा अध्ययन में पाया गया कि ब्लैक कार्बन जिसे आमतौर पर कालिख के रूप में जाना जाता है, जलवायु परिवर्तन को तेज करने और मौसम की चरम परिस्थितियों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एटमॉस्फेरिक पॉल्यूशन रिसर्च पत्रिका में प्रकाशित इस शोध में कहा गया है कि अगर ब्लैक कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जाए तो जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा किया जा सकता है। कालिख कार्बनिक (कार्बन युक्त) पदार्थों जैसे लकड़ी, ईंधन, तेल, प्लास्टिक और घरेलू कचरे के अधूरे जलने का उपोत्पाद है। कालिख बनाने वाले महीन काले या भूरे रंग के पाउडर में आर्सेनिक, कैडमियम और क्रोमियम सहित कई कार्सिनोजेन्स हो सकते हैं। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों, बर्फ की चादरों और समुद्री बर्फ के पिघलने की गति को तेज करता है, विशेष रूप से आर्कटिक और हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में। दक्षिण एशिया में इसका उत्सर्जन मानसून की बारिश के स्वरूप को गंभीर रूप से बाधित करता है, जिससे बाढ़ और चरम मौसम की घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है। इससे खाद्य सुरक्षा और लोगों की आजीविका पर भी खतरा मंडराने लगता है।
स्रोत और आर्थिक प्रभाव
अध्ययन के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में मानवजनित ब्लैक कार्बन का जमाव 45 से 66 फीसदी तक है। यह आवासीय ठोस ईंधन जलाने और ईंट भट्टों से आता है। इसमें अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार और पाकिस्तान का योगदान भी है। इसके अलावा, चावल मिलें और चीनी उद्योग भी प्रमुख योगदानकर्ता हैं। ब्लैक कार्बन पीएम 2.5 के प्रमुख घटकों में से एक है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक है। रिपोर्ट के अनुसार 2021 में इससे जुड़े वायु प्रदूषण के कारण 80 लाख से अधिक मौतें समय से पहले हुईं। साथ ही इस प्रदूषण के कारण वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जडीपी) का 6 फीसदी से अधिक खर्च हो रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और वंचित समुदायों पर पड़ता है।