फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Food Chain: खाद्य शृंखला में दोगुने हो रहे फॉरएवर केमिकल, इंसान तक पहुंचा खतरा; हर पायदान पर बढ़ा पीएफएएस

Wed, 31 Dec 2025 05:37 AM IST
पवन पांडेय अमर उजाला नेटवर्क

सार

Forever chemicals Doubling In Food Chain: ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में हुए इस शोध के निष्कर्ष जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में छपे हैं। शोध में जलीय और स्थलीय दोनों तरह के पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं। ये रसायन समुद्री मछलियों और पक्षियों में पाए गए हैं।
विज्ञापन
Food Cities - फोटो : Adobe stock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दुनिया की खाद्य शृंखला में एक ऐसा अदृश्य खतरा बढ़ रहा है, जो अंततः इंसान तक पहुंच रहा है। 119 जलीय और स्थलीय खाद्य शृंखलाओं के वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि फॉरएवर केमिकल कहे जाने वाले पीएफएएस (पर-एंड पॉली-फ्लोरो अल्काइल सब्स्टेंसेस) हर स्तर पर औसतन दोगुने हो जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है शीर्ष शिकारी जीवों के साथ-साथ इंसान भी इन जहरीले रसायनों के खतरनाक स्तर के संपर्क में हैं।
विज्ञापन


ये भी पढ़ें- खुलासा: अरावली टूटी तो बिगड़ेगा दिल्ली का मौसम; सर्दियों में चरम पर होंगे ठंड और प्रदूषण, लू का प्रकोप बढ़ेगा

भोजन बना मुख्य मार्ग
अध्ययन बताता है कि खाद्य शृंखला में शीर्ष पर होने के कारण इंसानों के लिए भोजन पीएफएएस के शरीर में पहुंचने का एक प्रमुख रास्ता बन गया है। कई पूर्व अध्ययनों में इन रसायनों को हार्मोनल गड़बड़ी, प्रतिरक्षा तंत्र पर असर और कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम से जोड़ा गया है। रिकोफी चेतावनी देते हैं कि शीर्ष शिकारी जीवों में पीएफएएस का तेज जमाव पर्यावरणीय जोखिमों की एक खतरनाक कड़ी की ओर इशारा करता है।
विज्ञापन


ज्यादा सुरक्षित बताए गए नए रसायन भी सवालों के घेरे में
इस अध्ययन में 72 अलग-अलग पीएफएएस का विश्लेषण किया गया। नतीजों से पता चला कि कुछ ऐसे नए रसायन, जिन्हें पुराने पीएफएएस की तुलना में ज्यादा सुरक्षित बताकर बाजार में उतारा गया था, वे भी खाद्य शृंखला में उतनी ही तेजी से और कुछ मामलों में उससे भी अधिक जमा हो रहे हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर इनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों को समय रहते नहीं समझा गया, तो ये भी उतनी ही बड़ी समस्या बन सकते हैं।
विज्ञापन


ये भी पढ़ें - चिंताजनक: काम के बोझ में बीमार हो रहे डॉक्टर, 48% को हाई बीपी, हर चौथा डायबिटीज का शिकार; शोध में खुलासा

नीतियों में बदलाव की जरूरत
शोधकर्ताओं ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि रसायनों के नियमन में अक्सर उनकी तात्कालिक विषाक्तता को ही आधार बनाया जाता है, जबकि यह नहीं आंका जाता कि वे खाद्य शृंखला में कितनी तेजी से जमा होते हैं। रिकोफी के शब्दों में, हमारे निष्कर्ष कई स्तरों पर तुरंत नीतिगत कार्रवाई की मांग करते हैं। सिर्फ विषाक्तता नहीं, बल्कि फूड चेन में बढ़ने की क्षमता को भी नियमों का आधार बनाया जाना चाहिए।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें