गलत मुकदमों के कारण 20 साल तक जेल की सजा काटने वाले विष्णु तिवारी जैसे कई बेगुनाहों को मुआवजा दिया जाए और इस संबंध में केंद्र सरकार बाकायदा दिशा-निर्देश बनाए। सुप्रीम कोर्ट में ऐसी मांग वाली याचिका दायर की गई है और केंद्र सरकार को इस संबंध में निर्देश देने की अपील की गई है।
वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय की इस याचिका के मुताबिक, संविधान का संरक्षक और जीवन के अधिकार, स्वतंत्रता और गरिमा का रक्षक होने के नाते कोर्ट गलत मुकदमों के पीड़ितों को मुआवजे के लिए दिशा-निर्देश तय करने में अपनी पूर्ण सांविधानिक शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह के बहुत से झूठे मामले सामने आए हैं। ऐसे निर्दोष व्यक्तियों के लिए कोई भी प्रभावी वैधानिक और कानूनी तंत्र नहीं है, जो उसे इंसाफ दिला सके। यह एक तरह से न्याय की हत्या है और हमारे देश के आपराधिक न्यायशास्त्र में एक ब्लैकहोल है। याचिका के मुताबिक, जिन्हें फर्जी मामलों में फंसाया जाता है। उनके मुआवजे के लिए कोई भी कानूनी व्यवस्था नहीं है।
इस कारण पीड़ित के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। जिन निर्दोष लोगों को पुलिस की तरफ से फर्जी केसों में फंसाया जाता है, उनका परिवार तबाह हो जाता है। कई बार उनके जीवन में कोई उम्मीद नहीं बचती तो वह आत्महत्या तक के लिए मजबूर हो जाते हैं।
...हाईकोर्ट ने बरी तो किया, पर दिलवाया मुआवजा?
याचिका में कहा गया है कि इस साल 28 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन विवाद के एक मामले में पाया कि आरोपी विष्णु तिवारी बेगुनाह हैं। विष्णु को 16 सितंबर, 2000 को गिरफ्तार किया गया था। उस पर दुष्कर्म और अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के तहत अत्याचार के मामले में मुकदर्मा दर्ज किया गया था। उसे 20 साल जेल में गुजारना पड़ा। हाईकोर्ट ने विष्णु को बरी तो कर दिया, मगर उसे कोई मुआवजा नहीं दिलवाया।
मूल अधिकारों को किया जा रहा आहत
याचिका में कहा गया है कि यह नागरिकों के मूल अधिकारों पर बड़ी चोट है। केंद्र की निष्क्रियता के कारण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटी युक्त स्वतंत्रता और सम्मान के साथ नागरिकों के जीवन के अधिकार को आहत किया जा रहा है।
जेलों में बंद हैं चार लाख से ज्यादा कैदी, 32 फीसदी ही दोषी साबित
भारतीय जेल सांख्यिकी, 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर की जेलों में 4,19,613 कैदी हैं। इनमें से 67.2 फीसदी यानी 2,82,076 पर मुकदमा चल रहा है, जबकि महज 32 फीसदी यानी 1,34,168 ही दोषी करार दिए गए थे।