जम्मू कश्मीर सरकार से भाजपा के पीछे हटने पर अब तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी राय देने लगी हैं। महबूबा मुफ्ती ने भी सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है जिसके बाद शाम पांच बजे पार्टी नेताओं की बैठक होनी है। खबर है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला राज्यपाल एनएन वोहरा से मिले हैं। शाम चार बजे नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी अपने नेताओं की बैठक बुलाई है। वहीं इस गठबंधन सरकार के टूटने पर शिवसेना ने कहा है कि पहले ही ये एक अनौपचारिक गठबंधन था। किसी भी तरह इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहले से ही मजबूत नहीं माना जा रहा था।
उधर कांग्रेस की तरफ देख रही पीडीपी को समर्थन मिलने में मुश्किल है। क्योंकि कांग्रेस चाहती है कि सूबे में राज्यपाल शासन हो। ऐसे में पीडीपी के लिए एकलौता चांस भी हाथ से निकलता दिख रहा है। पीडीपी का कहना है कि वो भाजपा के इस फैसले से चकित है क्योंकि इससे पहले उसे कोई ऐसे संकेत नहीं मिले जिससे उसे सरकार पर आने वाले इस संकट का पता चले। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने तो बीजेपी के इस फैसले पर खुशी जाहिर की है।
गुलाम नबी आजाद ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे खुशी है कि केन्द्रीय सरकार ने अपनी गलती मान ली, अपनी गलती स्वीकार की और ये तीन साल बीजेपी और पीडीपी, जम्मू-कश्मीर में सरकार चलाने में पूरी तरह असफल हुए और इन सवा तीन सालों में इन्होंने जम्मू-कश्मीर को बर्बाद किया, तबाह कर दिया। कांग्रेस व नेशनल कांग्रेस की जब-जब जम्मू-कश्मीर में सरकार रही, हम लोगों ने आतंकवाद को खत्म किया था, जम्मू-कश्मीर को एक पटरी पर, राजनीतिक पटरी पर, डेवलपमेंट की पटरी पर ला कर विकास शुरु हो गया था। लेकिन जबसे बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में पहली दफा सरकार में कदम रखा, तो हमने उसी दिन बताया था कि जम्मू-कश्मीर की बर्बादी शुरु हो गई। मैंने पार्लियामेंट में भी कहा था कि जहाँ-जहाँ भी आपके कदम पड़ते हैं, वहाँ आग लग जाती है और वही जम्मू-कश्मीर में भी हुआ।
इन तीन - सवा तीन वर्षों में बीजेपी और पीडीपी की कोलेशन सरकार के दौरान सबसे ज्यादा युद्ध विराम का उल्लंघन जम्मू-कश्मीर की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर हुए। सबसे ज्यादा सिक्योरिटी फोर्सिस के जवानों को शहादत देनी पड़ी, आर्मी जवान मारे गए, पुलिस के, पैरामिलिट्री फोर्सिस के लोग मारे गए, सबसे ज्यादा सिविलियन मारे गए, सबसे ज्यादा सिविलियन जख्मी भी हुए। तो सबसे ज्यादा जो आंकड़े आते हैं, सब चीज में वो बीजेपी और पीडीपी के कोटे में जाते हैं।
आज जम्मू-कश्मीर को बर्बाद करके, तबाह करके अब बीजेपी सारा दोष पीडीपी के मत्थे फोड़ कर नहीं भाग सकती। बीजेपी की सरकार, केन्द्र की सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकती, अपनी नाकामी से नहीं भाग सकते। उन्होंने जो गलती की, मैंने प्रधानमंत्री जी को 2015, मार्च के पहले हफ्ते में राष्ट्रपति जी के अभिभाषण में बोलते हुए कहा था, माननीय प्रधानमंत्री जी बैठे हुए थे, क्योंकि उन्हीं दिनों, उसी हफ्ते में उनकी सरकार बनी, मुफ्ती जी के साथ। तो मैंने प्रधानमंत्री जी को बताया था कि जम्मू-कश्मीर में आप सरकार बना रहे हैं, ये हिमालयन जैसी गलती होगी और हम सही साबित हुए कि वो हिमालयन गलती थी और एक तजुर्बा इन्होंने किया, क्योंकि इनको जम्मू-कश्मीर में सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। जम्मू-कश्मीर में इतिहास-भूगोल से इनका कोई लेना-देना था नहीं, क्योंकि पूरी उम्र भर इन्होंने कश्मीर के खिलाफ प्रोपेगंडा करके तो अपनी पार्टी बनाई थी और फिर वहीं 70 साल के बाद सरकार चलाना चाहते थे, जो असंभव चीज थी। जो कुछ हुआ, मुझे लगता है कि ठीक ही हुआ। अतिरिक्त तबाही और बर्बादी से जम्मू-कश्मीर के लोग बच गए, जिस तबाही का शिकार पिछले तीन, सवा साल से जम्मू-कश्मीर के लोग हुए थे।
पीडीपी नेता नईम अख्तर ने महबूबा के इस्तीफे का ऐलान करते हुए कहा कि उन्हें भी कुछ ज्यादा समझ नहीं आ रहा है। पार्टी बैठक में ही बात होगी कि आगे क्या करना है। बता दें कि सूबे में विधानसभा की कुल 87 सीटें हैं, जिसमें पीडीपी के पास 28 और भाजपा के खाते में 25 सीटें हैं।
उधर विपक्ष की तिजोरी खंगालें तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 15 और कांग्रेस के पास 12 सीटें हैं। बात करें अन्य की तो उनके पास भी कुल मिलाकर 9 सीटें हैं। ऐसे में भाजपा के पीडीपी से समर्थन वापस लेने से पीडीपी की दूसरी पार्टी से सेटिंग की संभावना बन रही है लेकिन कांग्रेस ने इसमें कोई देरी नहीं की कि वो भी पीडीपी के साथ नहीं आना चाहती है। बीजेपी के बिना पीडीपी, एनसी और कांग्रेस के विधायकों को अगर मिला दें तब भी विधानसभा में बहुमत पूरा हो सकता है। तीनों के पास कुल 55 सीटें हो जाएंगी, जो बहुमत से काफी अधिक है।
सूत्रों का कहना है कि आपरेशन ऑलआउट के चलते ये गठबंधन टूटा है, बता दें कि पीडीपी सीजफायर खत्म करने के लिए तैयार नही थी। पीडीपी अलगाववादियों से बातचीत की पक्षधर थी, जिससे भाजपा पर बड़ा दबाव था और इससे सरकार में शामिल भाजपा मंत्री बातचीत के विरोध में थे।