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Cloud Burst: बदल गया बादलों के फटने का ट्रेंड, तीन से चार हजार फीट की ऊंचाई पर फट रहे बादल

आशीष तिवारी
Updated Thu, 01 Aug 2024 04:47 PM IST

सार

मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा कहते हैं कि पिछले साल भी हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के राज्यों में बादलों के फटने की पहले से एडवाइजरी जारी की जा चुकी थी। विभाग को अनुमान था कि इन इलाकों में तेज बारिश और क्लाउड बर्स्ट होंगे।
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IMD - फोटो : Amar Ujala

 

मौसम वैज्ञानिक डॉक्टर पवन यादव कहते हैं कि जिस तरीके से हिमाचल प्रदेश में बादलों के फटने की सूचनाएं आ रही हैं, वह एक बार फिर से इस राज्य को चिंता की ओर लेकर जा रही है। डॉ यादव कहते हैं कि पिछले साल भी हिमाचल प्रदेश में ऐसे ही बड़ी तबाही मची थी। तब भी लगातार बादलों के फटने से हालात बदहाल हो गए थे। इस बार फिर से एक बार इस पैटर्न पर बादलों के फटने का सिलसिला शुरू हुआ है। उनका कहना है कि बीते कुछ वर्षों में बादलों के बरसने की टाइमिंग भी बदली है और बादलों के फटने की ऊंचाई भी घटकर कम हो गई है। वह कहते हैं कि ऐसा बदलते हुए मौसम और क्लाइमेट चेंज के चलते ही हो रहा है। उनका मानना है कि नमी और हवाओं में दबाव की भिन्नता के चलते क्लाउड बर्स्ट की ऊंचाई घटकर कम हो गई है। 


मौसम वैज्ञानिक डॉक्टर यादव कहते हैं कि बीते बरस जिस तरीके से बारिश ने हिमाचल मे तबाही मचाई थी, उसका बड़ा कारण कम ऊंचाई पर बादलों का फटना भी था। उनका कहना है कि अमूमन बादलों के फटने की प्रक्रिया छह हजार फीट से गुजरने वाले बादलों में होती थी। लेकिन पिछले कुछ समय से यह नोटिस किया जा रहा है कि जिन इलाकों में क्लाउड बर्स्ट हो रहा है वहां की ऊंचाई सामान्यतः होने वाले क्लाउड बर्स्ट की तुलना में बहुत कम है। इस वक्त हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में बादलों के फटने की ऊंचाई तीन से चार हजार फीट तक पहुंच चुकी हैं। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले वर्ष जिस तरह से हिमाचल के कांगड़ा में बादल फटा था, इतनी ऊंचाई वाले इलाकों में अमूमन बदल के फटने की घटनाएं नहीं होती थीं। इस बार भी जिन इलाकों में बादल फटने की सूचनाएं मिल रही हैं, उनकी ऊंचाई भी सामान्यतः कम ही है।


मौसम वैज्ञानिक आरएन प्रजापती कहते हैं कि बादलों के फटने का सिलसिला कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ज्यादा खतरनाक होता है। उनका कहना है कि अमूमन पहाड़ों पर आबादी तो हर हिस्से में होती ही है, लेकिन सबसे ज्यादा आबादी पहाड़ के शुरुआती चार हजार फीट की ऊंचाई वाले हिस्सों में भी खूब होती है। ऐसे में अगर बादलों के फटने का सिलसिला कम ऊंचाई पर होगा, तो ज्यादा से ज्यादा आबादी प्रभावित होगी और खतरा बढ़ेगा। वह बताते हैं कि हिमाचल से लेकर उत्तराखंड में बारिश ने बीते कुछ दिनों में कुछ ऐसे ही बादल फटने के ट्रेंड दिखाने शुरू किए हैं। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि अगर यह सिलसिला लगातार चला तो कहीं कोई बड़ी तबाही ना आ जाए। 


मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जितना ज्यादा क्लाउड बर्स्ट होगा, उतना ही बड़ा खतरा पहाड़ों के खिसकने और लैंड स्लाइडिंग का बना रहेगा। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक रहे डीपी शुक्ला कहते हैं कि पहाड़ों पर लगातार हो रही बारिश के साथ-साथ अचानक होने वाली क्लाउड बर्स्ट जैसी घटना से पहाड़ों का कमजोर होना शुरू हो जाता है। जब यह पहाड़ कमजोर होते हैं, तो अचानक लैंडस्लाइडिंग और पहाड़ के खिसकने जैसी घटनाएं भी होने लगती है। उनका कहना है कि यह परिस्थितियां बेहद चिंताजनक हैं। जरूरी यह है कि अब पहाड़ों पर होने वाली बसावट का नए सिरे से ध्यान रखकर डेवलपमेंट किया जाना चाहिए। ताकि बदले हुए मौसम और क्लाइमेट चेंज के असर से पहाड़ों पर आने वाली आपदाओं और उससे प्रभावित होने वाले लोगों को बचाया जा सके।


मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा कहते हैं कि पिछले साल भी हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तराखंड और पूर्वोत्तर के राज्यों में बादलों के फटने की पहले से एडवाइजरी जारी की जा चुकी थी। विभाग को अनुमान था कि इन इलाकों में तेज बारिश और क्लाउड बर्स्ट होंगे। मौसम विभाग के मुताबिक इस बार भी कुछ पहाड़ी राज्यों के लिए ऑरेंज और रेड अलर्ट जारी किया गया है। इसके लिए बाकायदा संबंधित राज्यों को पहले से ही किसी बड़ी घटना के प्रति सजग रहने के लिए आगाह किया जा चुका है।


मौसम वैज्ञानिक सुरेंदर देसाई कहते हैं कि बादल फटने का मतलब यह बिल्कुल नहीं होता है कि आकाश में बना हुआ बादल एकदम से गुब्बारे की तरह फट कर पूरा पानी एक जगह पर उड़ेल दे। सुरेंद्र देसाई कहते हैं कि बादल फटने की घटना तब होती है, जब एक साथ बहुत ज्यादा नमी वाले बादल एक जगह पर ही रुक जाते हैं। चूंकि बादलों में इतनी ज्यादा नमी होती है और बादलों के रुकने से बूंदों का वजन बढ़ने लगता है। ऐसी दशा में बादलों का घनत्व भी बढ़ जाता है। इन हालातों में मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है, जिसे बादल फटना या क्लाउड बर्स्ट कहते हैं। मौसस वैज्ञानिक सुरेंद्र देसाई कहते हैं कि पहाड़ों पर यह घटनाएं इसलिए सबसे ज्यादा होती हैं, क्योंकि उनकी ऊंचाई के बीच में बादल फंस जाते हैं और अपनी इसी प्रक्रिया की वजह से बादल फट जाते हैं। वह कहते हैं कि बादल फटने की घटना के दौरान 100 मिलीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पानी बरसता है। हालांकि देसाई कहते हैं कि जिस तरीके से कम ऊंचाई वाले क्षेत्र में बादलों के फटने की घटनाएं बढ़ी हैं, उससे बहुत ज्यादा प्राकृतिक आपदा और जान माल के नुकसान का खतरा बढ़ गया है। 

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