सार
2026 की शुरुआत ने जलवायु परिवर्तन की गंभीरता उजागर कर दी है। जनवरी में लू, जंगलों की आग, बाढ़ और भीषण ठंड ने कई देशों में जनजीवन प्रभावित किया। डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में रिकॉर्ड तापमान और भीषण आग ने हालात और बिगाड़ दिए।
साल 2026 की शुरुआत ने साफ कर दिया कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई बन चुका है। साल के पहले महीने में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लू, जंगलों की आग, मूसलाधार बारिश, बाढ़, भीषण ठंड और रिकॉर्ड बर्फबारी ने सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) पहले ही अनुमान जता चुका है कि 2026 अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है।
यही बढ़ता औसत तापमान मौसम के पैटर्न को अस्थिर बना रहा है, जिससे कहीं रिकॉर्ड तोड़ गर्मी तो कहीं अचानक जानलेवा ठंड देखने को मिल रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार लंबे समय से जारी वैश्विक तापवृद्धि ने चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों को बढ़ाया है।
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ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में लू और आग
जनवरी में ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका को लू और आग के कहर का सामना करना पड़ा। दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के सेडुना शहर में 26 जनवरी को तापमान 49.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो ऐतिहासिक रिकॉर्ड के करीब था। दक्षिण अमेरिका में भी तस्वीर अलग नहीं थी। चिली के बायोबियो और न्युब्ले क्षेत्रों में लगी भीषण जंगल आग ने भारी तबाही मचाई। 75 से अधिक स्थानों पर फैली आग के कारण सरकार को आपात स्थिति घोषित करनी पड़ी।
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अमेरिका-कनाडा में ठंड का विकराल रूप
कमजोर पड़ते ध्रुवीय भंवर के कारण आर्कटिक की ठंडी हवाएं उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया तक फैल गईं। अमेरिका और कनाडा में हड्डियां जमा देने वाली ठंड और बर्फीले तूफानों ने कई लोगों की जान ली। अमेरिकी राष्ट्रीय मौसम सेवा (एनडब्ल्यूएस) ने चेतावनी दी कि जनवरी के अंत तक यह ठंड मैदानी इलाकों, ग्रेट लेक्स क्षेत्र और पूर्वी हिस्सों तक फैल सकती है।
इसके साथ ही यह दशकों की सबसे लंबी ठंड साबित हो सकती है। रूस के कामचटका प्रायद्वीप में हालात और भी असामान्य रहे। जनवरी के पहले दो हफ्तों में यहां दो मीटर से अधिक बर्फबारी हुई, जबकि दिसंबर में ही 3.7 मीटर बर्फ गिर चुकी थी, जिससे जनजीवन लगभग ठप हो गया।
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