जब दुनिया रिकॉर्ड गर्मी, बढ़ते उत्सर्जन और चरम मौसमी आपदाओं से जूझ रही है, उसी समय जलवायु संकट पर वैश्विक मीडिया का फोकस कमजोर पड़ता जा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो की मीडिया एंड क्लाइमेट चेंज ऑब्जर्वेटरी (एमईसीसीओ) के ताजा विश्लेषण के अनुसार 2025 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी खबरों में 14 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यह लगातार चौथा साल है जब कवरेज कम हुई है, जो बढ़ते खतरे के बीच गंभीर संकेत है।
एमईसीसीओ के विश्लेषण से पता चलता है कि 2025 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी वैश्विक कवरेज में 14 फीसदी की गिरावट आई है, जबकि 2021 के उच्चतम स्तर की तुलना में यह गिरावट 38 फीसदी तक पहुंच चुकी है। वर्ष 2025 में जलवायु खबरों का स्तर पिछले 22 वर्षों में महज 10वें स्थान पर रहा, जो इस मुद्दे की घटती प्राथमिकता को दर्शाता है। यह गिरावट किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अफ्रीका, मध्य पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे सभी प्रमुख क्षेत्रों में जलवायु खबरों की जगह सिकुड़ती देखी गई है।
रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और विशेषज्ञ मैक्स बॉयकॉफ के अनुसार, जलवायु कवरेज में गिरावट के पीछे कई संरचनात्मक और राजनीतिक कारण हैं। उन्होंने बताया कि न्यूजरूम में लगातार हो रही कटौती, संसाधनों की कमी और मीडिया संस्थानों का एकीकरण इस गिरावट को बढ़ा रहा है। इसके साथ ही आर्थिक दबाव भी मीडिया संगठनों की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर रहा है।
जटिल और संवेदनशील मुद्दा
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। बावजूद खबरों की सीमित जगह में दूसरे मुद्दे हावी हो जाते हैं, जिससे जलवायु जैसे दीर्घकालिक संकट पीछे छूट जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार आम लोग जलवायु संकट को मुख्य रूप से मीडिया के जरिए ही समझते हैं, क्योंकि वे वैज्ञानिक शोध पत्रों तक सीधे नहीं पहुंचते। ऐसे में जब मीडिया इस मुद्दे को पर्याप्त और प्रभावी ढंग से नहीं उठाता, तो लोगों की समझ सीमित रह जाती है और संकट की गंभीरता का सही आकलन नहीं हो पाता। इसका सीधा असर नीतिगत निर्णयों और जनभागीदारी पर भी पड़ता है।
खतरनाक विरोधाभास
वर्तमान स्थिति एक खतरनाक विरोधाभास को दर्शाती है, जहां एक तरफ जलवायु संकट तेजी से गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी मौजूदगी खबरों में लगातार घटती जा रही है। यह खामोशी अपने आप में एक गंभीर चेतावनी है, क्योंकि जब किसी संकट की आवाज कमजोर पड़ जाती है, तो उस पर कार्रवाई की संभावना भी कम हो जाती है। ऐसे में जलवायु संकट अब केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि सूचना और जागरूकता का भी संकट बन गया है, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य के लिए भारी पड़ सकता है।