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जलवायु परिवर्तन और संकट: बारिश नहीं जल संतुलन असली चुनौती, क्या वाष्पोत्सर्जन तय करेगा पानी का भविष्य?

Mon, 02 Mar 2026 05:59 AM IST
Shubham Kumar अमर उजाला नेटवर्क

सार

जलवायु परिवर्तन के दौर में केवल यह देखना काफी नहीं कि कितनी बारिश हुई। असली सवाल यह है कि जमीन पर कितना पानी बचा। अध्ययन बताते हैं कि वाष्पोत्सर्जन की एक सीमा होती है, इसलिए वर्षा में छोटा बदलाव भी जल उपलब्धता को गहराई से प्रभावित कर सकता है। शुष्क और संवेदनशील क्षेत्रों में यह असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है।

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जलवायु परिवर्तन - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन के दौर में यह सवाल कि कितनी बारिश हुई अब पर्याप्त नहीं रह गया है। असली चिंता यह है कि बारिश के बाद धरती पर कितना पानी बचता है। हाल ही में नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि वाष्पोत्सर्जन की एक अधिकतम सीमा होती है, जो तापमान या वनस्पति परिवर्तन से अनंत तक नहीं बढ़ती। ऐसे में वर्षा में छोटा सा बदलाव भी जल उपलब्धता पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है खासतौर पर शुष्क और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र वाले क्षेत्रों में।

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जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न, तापमान और वाष्पोत्सर्जन की दरों में बदलाव आ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस बदलते संतुलन को समझे बिना जल संकट या बाढ़ जैसे खतरों का सही आकलन संभव नहीं है। बारिश में मामूली कमी या बढ़ोतरी भी जल संसाधनों की वास्तविक उपलब्धता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। विशेषकर वे पारिस्थितिकी क्षेत्र, जो पहले से ही जल संतुलन की नाजुक अवस्था में हैं, वहां यह प्रभाव अधिक तीव्र हो सकता है। वैज्ञानिक जल चक्र को एक बजट की तरह समझाते हैं।

जैसे घर में आय और खर्च होता है, वैसे ही प्रकृति में भी पानी की आय और खर्च का संतुलन होता है। वर्षा और हिमपात पानी की आय हैं, जबकि वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन उसका खर्च। वाष्पोत्सर्जन वह प्रक्रिया है जिसमें पौधे जड़ों से पानी लेकर पत्तियों के माध्यम से उसे वायुमंडल में छोड़ते हैं। जमीन से होने वाले कुल जल नुकसान का बड़ा हिस्सा इसी प्रक्रिया से होता है। इसलिए यदि वर्षा अधिक भी हो, लेकिन वाष्पोत्सर्जन तेज हो, तो उपयोग के लिए उपलब्ध पानी सीमित रह सकता है।
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शुष्क क्षेत्रों में बढ़ता खतरा
सूखे और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में यह प्रभाव सबसे अधिक गंभीर हो सकता है। यदि इन क्षेत्रों में वर्षा थोड़ी भी घटती है, तो जल उपलब्धता तेजी से कम हो सकती है। इसका सीधा असर कृषि, वनस्पति और वन्यजीवों पर पड़ेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस्राइल जैसे शुष्क क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र पहले से ही अपनी सीमा के करीब हैं। जलवायु परिवर्तन उन्हें और अधिक अस्थिर बना सकता है, जिससे जल संकट गहरा सकता है।

आर्द्र क्षेत्रों में बाढ़ का जोखिम
इसके विपरीत नमी वाले या आर्द्र क्षेत्रों में वर्षा में मामूली बढ़ोतरी भी अतिरिक्त जल संचय का कारण बन सकती है। चूंकि वाष्पोत्सर्जन एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ सकता, इसलिए अतिरिक्त पानी सतह पर जमा हो सकता है। इससे बाढ़ और अचानक बाढ़ की घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रूप ले सकता है।

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