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Climate change: सामाजिक संरचनाओं व पहचान से जुड़ा मुद्दा है जलवायु परिवर्तन

Mon, 03 Apr 2023 06:09 AM IST
Jeet Kumar ईशान चतुर्वेदी

सार

भारत, जी 20 और स्थिरता : इससे पहले दुनिया अपनी प्रगति की तुलना में कम अच्छी कहां दिख रही थी। नवंबर 2021 में, पीएम मोदी ने ग्लासगो शिखर सम्मेलन में आगे बढ़कर भारत के लिए नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य का वादा किया था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
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विस्तार
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भारत की जी-20 की अध्यक्षता की यात्रा शुरू करने के तुरंत बाद पीएम मोदी ने अन्य बातों के अलावा वैश्विक नेताओं से जो स्पष्ट आह्वान किया था, वह था, दुनिया को जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग करना चाहिए। यह पहली बार नहीं है जब भारत ने इस बारे में बात की थी कि जलवायु परिवर्तन को कितना महत्व मिलना चाहिए। नवंबर 2021 में, पीएम मोदी ने ग्लासगो शिखर सम्मेलन में आगे बढ़कर भारत के लिए नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य का वादा किया था।

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यह कठिन, अनिश्चित और शायद ऐसी मांग है, जिसे पूरा करने की जरूरत है, क्योंकि भारत 'वसुधैव कुटुम्बकम' और 'प्रकृति' के अपने सांस्कृतिक अनुपातों को लागू करने की कोशिश कर रहा है। कई अन्य विकसित देशों के विपरीत, विशिष्टताएं अब भी केवल भारत को इस तरह से एजेंडे में प्राथमिकता तय करने की अनुमति देती हैं जो उन उद्योगों पर निर्भर असंख्य लोगों को परेशान नहीं करतीं जो कमोबेश कार्बन-केंद्रित कारकों पर निर्भर हैं।

विश्व स्तर पर, स्थिरता का एकल वाक्यांशों में गलत अर्थ निकाला जा सकता है: पेड़ बचाओ, हरियाली लाओ; दावानल रोकें और स्थिर बनें; ग्लेशियरों का पिघलना रोकें और आप बच जाएंगे आदि। शायद ही कभी जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई इतनी सरल रही हो। जलवायु परिवर्तन को समझने में पहला सबक यह है कि यह सिर्फ एक वैज्ञानिक तथ्य नहीं है, यह एक सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और जैव-विविधता से जुड़ा मुद्दा है जो एक साथ सत्ता की सामाजिक संरचनाओं, पहचान और पैसे से जुड़ा हुआ है। 
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'जलवायु को बचाओ और दुनिया को बचाओ', एक अनुलाप की तरह लग सकता है, लेकिन यह और कुछ भी हो, अनुलाप नहीं है। पिछले सौ वर्षों में, यह माना जा सकता है कि जीवन उस कीमत पर फला-फूला है जो ऐतिहासिक रूप से हमें प्रिय रहा है। नीचे लटकते फलों, रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से उगाए गए फलों-फसलों के लिए पर्यावरण संरक्षण के सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण बारीकियों को छोड़ दिया गया है। हम किस बारे में बात कर रहे हैं?

हम चिपको आंदोलन के बारे में बात कर रहे हैं जहां एक दशक से अधिक समय तक, कई गांवों ने पेड़ों की रक्षा करने का फैसला किया। हम समाज और थार रेगिस्तान की प्यास बुझाने वाली झाड़ी कैपरिस डेसिडुआ में लगने वाले सांगरी का आनंद लेने के बारे में बात कर रहे हैं। हम संस्कृति के बारे में बात कर रहे हैं ताकि हम जो कुछ भी रहे हैं, उसकी ओर देखें और जो हमें होना चाहिए, उसकी ओर देखें।

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