शोधकर्ताओं का कहना है कि गंगा मैदानों को छोड़कर देश के तकरीबन समूचे हिस्से में 1976 से 2018 तक अप्रैल से जून तक के सीजन में भीषण जानलेवा गर्मी वाले दिनों की संख्या औसतन 10 आंकी गई है। उन्होंने कहा कि 1951 से 1975 के बीच भीषण गर्मी वाले दिनों की संख्या में यह करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी है।
उत्तर भारत से है इस गर्मी का जुड़ाव
शोधकर्ताओं के मुताबिक, भीषण गर्मी वाले दिनों में बढ़ोतरी उत्तर भारत के ऊपर बने असामान्य उच्च दबाव वाली वायुमंडलीय प्रणाली का नतीजा है। इससे बने दबाव के कारण एडियाबैटिक कंप्रेशन (स्थिरोष्म संपीड़न) की प्रक्रिया के चलते वायुमंडलीय तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। जोशी के मुताबिक, इसके चलते आसमान में बादलों का कवच घटता है, जिससे सौर विकिरण की ज्यादा मात्रा सतह पर पहुंचकर भारतीय भूमि के तापमान को और ज्यादा गर्म कर रही है।
पूरे देश में घट रही मिट्टी की नमी
वैज्ञानिकों ने शोध में यह भी पाया है कि पूरे देश में सतह की मिट्टी की नमी का स्तर खतरनाक गति से कम हुआ है। उनका मानना है कि इसने भी भीषण गर्मी को बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। जोशी ने कहा, मिट्टी की नमी वाष्पीकरण के जरिये सौर विकिरण के थोड़े से प्रभाव को बेकार कर देती है। इसकी कमी के चलते विकिरण का पूरा असर भूमि के तापमान पर हो रहा है।
ज्यादा सिंचाई के चलते बचे हुए हैं गंगा के मैदान
जोशी के मुताबिक, गंगा नदी के आसपास के मैदानी क्षेत्र विश्व में सबसे ज्यादा सिंचाई वाले जोन हैं। यहां पर्याप्त हरियाली, जल निकायों से वाष्पीकरण की दर और पौधों से वाष्पोत्सर्जन भरपूर मात्रा में होता है। इसके चलते इस क्षेत्र में भीषण गर्मी का प्रभाव किसी हद तक नियंत्रित हो जाता है।