पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1951-2015 तक भारत में होने वाली बारिश में गिरावट देखी गई है। बारिश में यह कमी सिंधु-गंगा के मैदान और पश्चिमी छोर पर भी देखी गई है। इन क्षेत्रों में बारिश कम होने से अन्न उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
वहीं, पिछले 65 साल के मानसून के आंकड़ों के अध्ययन से निकल कर आया कि तेज बारिश के दिन बढ़े हैं, जिस कारण बाढ़ की स्थितियां अधिक सामने आ रही हैं। इसके लिए अधिक स्थानीय कारणों और भूमि उपयोग और एरोसोल की सघनता इसका एक बड़ा कारण है।
भारत में बाढ़ से 1953-2017 तक कुल 1,07,487 लोगों की मौत हो चुकी है। केंद्रीय जल आयोग की राज्य सभा में प्रस्तुत की गई एक रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ से 3,65,860 करोड़ रुपये की फसलों और सम्पत्तियों का नुकसान हुआ है। बांध और नदियों के बारे में काम करने वाली संस्था एसएनडीआरपी के कोआर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “भारत में बाढ़ की स्थिति और गंभीर होगी, जहां बाढ़ नहीं आती थी, वहां भी बहुत कम समय में तेज गति से बाढ़ आएगी। यह सब नदियों से छेड़छाड़ और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है।