इस साल की पहली छमाही (जनवरी- जून 2020) में गर्मी ने साइबेरिया में अस्सी हजार साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसके लिए जलवायु परिवर्तन और इंसानी गतिविधियां जिम्मेदार हैं। पीपी शिर्शोव इंस्टीट्यूट ऑफ ओसियनोलॉजी, रूसी विज्ञान अकादमी और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों और मौसम विज्ञान सेवाओं के शोधकर्ताओं ने यह भी पाया मनुष्यों द्वारा किए गए ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के कारण हुए जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ा वरना यह दो डिग्री से ज्यादा न बढ़ा होता। इसका असर पूरी दुनिया के तापमान पर पड़ना तय माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन के चलते ही भारत में एक सप्ताह में दो चक्रवाती तूफान के साथ ही पिछले साल दिसंबर से टिड्डी हमलों से दो-चार होना पड़ रहा है। इस साल के शुरुआत से ही साइबेरिया में तापमान औसत से ऊपर रहा है। आर्क टिक के लिए 38 डिग्री का एक नया रिकॉर्ड तापमान 20 जून को रूसी शहर वेरखोयांस्क में दर्ज किया गया था। जबकि साइबेरिया का कुल तापमान जनवरी से जून तक औसत से 5 डिग्री से अधिक था। इस उच्च तापमान पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मापने के लिए वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन चलाए जिसमें पाया गया कि वर्तमान के जलवायु परिवर्तन के अनुरूप एक डिग्री तक ग्लोबल वार्मिंग शामिल है।
वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया कि वर्तमान परिस्थितियों में जलवायु परिवर्तन का आकलन करें को इसमें लंबे समय तक ऐसी गर्मी की संभावना बहुत कम थी। लेकिन जिस तरह से ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। उस स्थिति में सदी के अंत तक हालात खराब होना तय है। इसके परिणाम स्वरुप कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं आना भी स्वाभाविक है।
इसी क्रम में साइबेरिया की गर्मी ने इलाके में कई जगह व्यापक आग भड़का दी जिसके चलते जून के अंत तक 1.15 मिलियन हेक्टेयर भूक्षेत्र जल चुके थे। इससे करीब 5.6 करोड़ टन कार्बन डाई-आक्साइड निकली। यह स्विट्जरलैंड, नॉर्वे जैसे कुछ औद्योगिक देशों के वार्षिक उत्सर्जन से काफी अधिक है। प्रोफेसर ओल्गा जोलिना के अनुसार इस अध्ययन से न केवल यह पता चलता है कि तापमान की परिमाण मात्रा अत्यंत दुर्लभ है। बल्कि इसके चलते मौसम के पैटर्न में भी कई तरह से उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं।