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चिंताजनक: जलवायु संकट की चिंता को लेकर युवाओं में बढ़ रहा आक्रोश, 94 फीसदी भविष्य को लेकर चिंतित

Mon, 16 Feb 2026 04:57 AM IST
देवेश त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

सर्वेक्षण में 88 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि वे अपने आसपास जलवायु में बदलाव महसूस कर रहे हैं, जबकि 67 प्रतिशत ने माना कि ये बदलाव उनके रोजमर्रा के जीवन और जीवनशैली को पहले ही प्रभावित कर चुके हैं। अध्ययन यह भी संकेत देते हैं कि पिछले 25 वर्षों में जन्मी पीढ़ी ने शायद कभी सामान्य जलवायु का अनुभव ही नहीं किया।
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जलवायु परिवर्तन - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरणीय चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि यह युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालने वाली वैश्विक समस्या बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ताजा रिपोर्ट और भारत में किए गए जनमत सर्वेक्षण से सामने आया है कि ईको एंजायटी यानी जलवायु से जुड़ी चिंता 21वीं सदी की पहली पीढ़ी के बीच तेजी से फैल रही है। दुख, निराशा, असहायता और गुस्से जैसी भावनाएं युवाओं में आम होती जा रही हैं, जबकि 94 प्रतिशत युवाओं ने माना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वे अपने भविष्य को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं।
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यूएनईपी ने अपनी रिपोर्ट नेविगेटिंग न्यू होराइजंस : ए ग्लोबल फोरसाइट रिपोर्ट ऑन प्लेनेटरी हेल्थ एंड ह्यूमन वेलबींग में चेताया कि दुनियाभर में युवाओं के बीच ईको एंजायटी एक उभरता हुआ संकट बन चुकी है। इसे क्लाइमेट ग्रीफ या जलवायु से जुड़ा दुख भी कहा जाता है, जो पर्यावरणीय क्षरण और जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों की प्रतिक्रिया है। डाउन टू अर्थ ने अक्टूबर–नवंबर 2025 के दौरान 16 से 25 वर्ष आयु वर्ग के 300 से अधिक युवाओं के बीच जनमत सर्वेक्षण किया।

इसमें 88 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि वे अपने आसपास जलवायु में बदलाव महसूस कर रहे हैं, जबकि 67 प्रतिशत ने माना कि ये बदलाव उनके रोजमर्रा के जीवन और जीवनशैली को पहले ही प्रभावित कर चुके हैं। अध्ययन यह भी संकेत देते हैं कि पिछले 25 वर्षों में जन्मी पीढ़ी ने शायद कभी सामान्य जलवायु का अनुभव ही नहीं किया। हीटवेव, चक्रवात और बाढ़ जैसी चरम घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं, और युवा इन्हें पहले से कहीं अधिक तीव्रता से महसूस कर रहे हैं। 
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36 फीसदी खाद्य गुणवत्ता में बदलाव को लेकर डरे
सर्वेक्षण में युवाओं से पूछा गया कि वे किन संकेतों को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं। दो-तिहाई से अधिक उत्तरदाताओं ने बढ़ते तापमान और असमय गर्मी या वर्षा को इसका प्रमुख संकेत माना। लगभग 40 प्रतिशत ने धुंध या कोहरे भरे दिनों को, 36 प्रतिशत ने खाद्य गुणवत्ता में बदलाव को और 32 प्रतिशत ने कीट-पतंगों की बढ़ती संख्या को जलवायु परिवर्तन से जोड़ा। 38 प्रतिशत युवाओं ने अत्यधिक ठंड को भी इसका एक लक्षण बताया।

असर सभी पर, लेकिन गरीबों पर सबसे ज्यादा
जब युवाओं से पूछा गया कि क्या जलवायु परिवर्तन का असर अलग-अलग आर्थिक वर्गों पर अलग तरह से पड़ता है, तो 61 प्रतिशत ने कहा कि यह अमीर, गरीब और मध्यम वर्ग सभी को समान रूप से प्रभावित करता है। लैंगिक आधार पर राय लगभग एक जैसी रही। करीब 90 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना था कि जलवायु परिवर्तन पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है।

चिंता, असहायपन और डर : युवाओं पर भावनात्मक बोझ
जलवायु संकट का भावनात्मक असर सर्वेक्षण में साफ झलकता है। प्रतिभागियों को अपनी भावनाएं चुनने के लिए छह विकल्प दिए गए...डरा हुआ और उदास, चिंतित, गुस्सा, असहाय, ठगे हुए और उदासीन। 57 प्रतिशत युवाओं ने खुद को चिंतित, 54 प्रतिशत ने असहाय और 43 प्रतिशत ने डरा हुआ और उदास बताया। कई युवाओं ने गुस्से और ठगे जाने की भावना भी व्यक्त की।भविष्य को लेकर आशंकाएं भी गहरी हैं।

करीब 53 प्रतिशत युवाओं को डर है कि जलवायु परिवर्तन से बीमारियां बढ़ेंगी, एक-तिहाई से अधिक ने खाद्य संकट की आशंका जताई और 45 प्रतिशत ने जल संकट को लेकर चिंता जताई। कुल मिलाकर 94 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन उनके भविष्य को लेकर उन्हें परेशान करता है, जबकि आधे प्रतिभागियों ने सरकारी कार्रवाई को निराशाजनक करार दिया।

विशेषज्ञों की राय : युवाओं की चिंता पूरी तरह जायज
विशेषज्ञ मानते हैं कि युवाओं की यह प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं है। क्लाइमेट एंजायटी पर बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन की सह-लेखिका और यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ से जुड़ी कैरोलिन हिकमैन कहती हैं, हमारे बच्चों की चिंता पूरी तरह जायज है, क्योंकि वे सरकारों की ओर से जलवायु परिवर्तन पर अपर्याप्त प्रतिक्रिया देख रहे हैं। उनके अनुसार बच्चे और युवा अब दुनियाभर में संगठित हो रहे हैं और सरकारों को अदालतों में चुनौती दे रहे हैं, यह तर्क देते हुए कि जलवायु संकट पर कार्रवाई न करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
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