कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने की निंदा की है। पार्टी ने इसे शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए बड़ा झटका बताया। सीजेपी ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए मंगलवार सुबह जंतर-मंतर पहुंचे अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने का भी विरोध किया।
पार्टी के अनुसार, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने की घोषणा 12 अक्तूबर को हुई थी। उसी दिन सीजेपी के प्रतिनिधि अपने प्रस्तावित शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए तारीख और समय तय कराने के लिए संसद मार्ग थाने पहुंचे थे।
सीजेपी ने कहा कि उसने पुलिस को प्रदर्शन का समय तय करने का विकल्प दिया था और 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा था। इसके बाद जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के आदेश ने शांतिपूर्ण विरोध के लिए सार्वजनिक स्थानों तक लोगों की पहुंच को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
तिरंगा लेकर पहुंचे नेताओं को हिरासत में लिया
सीजेपी के अनुसार, मंगलवार सुबह पार्टी के सह-संयोजक आशुतोष रांका, सौरव दास, राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे और पार्टी के अन्य सदस्य राष्ट्रीय ध्वज लेकर जंतर-मंतर पहुंचे। वे मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग कर रहे थे। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
सीजेपी के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दिपके ने कहा, ''आप विरोध को सूची से बाहर नहीं कर सकते। अगर सरकार को लगता है कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने से जवाबदेही की मांग करने वाले लोगों की आवाज दब जाएगी, तो उसने इस आंदोलन के उद्देश्य को नहीं समझा है। जंतर-मंतर केवल नक्शे पर मौजूद एक जगह नहीं है। यहां नागरिक सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करने के लिए जुटते रहे हैं। कोई भी प्रशासनिक आदेश लोकतंत्र की इस भावना को खत्म नहीं कर सकता।''
कई बड़े आंदोलनों का गवाह रहा है जंतर-मंतर
जंतर-मंतर दशकों से सार्वजनिक प्रदर्शनों का प्रमुख स्थल रहा है। यहां पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों, पूर्व सैनिकों की वन रैंक वन पेंशन की मांग, महिला पहलवानों के विरोध, किसान आंदोलनों और छात्र संगठनों के प्रदर्शनों सहित कई आंदोलन हुए हैं।
सीजेपी का कहना है कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने से सार्वजनिक विरोध की दृश्यता कमजोर हो सकती है। पार्टी के मुताबिक, इससे राजधानी के प्रमुख हिस्से में अपनी मांगें उठाने वाले लोगों की आवाज कम सुनाई दे सकती है।
आशुतोष रांका ने दिल्ली पुलिस पर लगाए क्या आरोप?
आशुतोष रांका ने कहा, ''आप नागरिकों से प्रदर्शन की अनुमति लेने के लिए अधिकारियों के पास जाने को नहीं कह सकते और फिर अनुमति मांगने के दौरान ही नियम बदल नहीं सकते। हम अपने प्रदर्शन की तारीख तय कराने के लिए पुलिस थाने गए थे। हमारी मांग साफ थी कि हमें बताया जाए कि हम जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कब कर सकते हैं। इसके बजाय उस स्थल को सूची से हटा दिया गया। हम ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें व्यवहार में विरोध करने का अधिकार अर्थहीन हो जाए।''
सीजेपी ने कहा कि यह मुद्दा केवल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं है। इसका संबंध इस सवाल से है कि क्या नागरिक सत्ता में बैठे लोगों को सार्वजनिक रूप से चुनौती दे सकते हैं और ऐसी जगह पर अपनी मांग रख सकते हैं, जहां उनकी बात सुनी और देखी जा सके। पार्टी ने कहा कि वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर के ऐतिहासिक और नागरिक महत्व की जगह अपने आप नहीं ले सकते, खासकर तब जब विरोध सार्वजनिक संस्थानों और चुनावी जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर हो।
आंदोलन जारी रखने का एलान
सीजेपी ने दोहराया कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की उसकी मांग में कोई बदलाव नहीं हुआ है। पार्टी ने कहा कि वह जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने के फैसले को चुनौती देती रहेगी। पार्टी ने कहा कि वह चुनावी जवाबदेही की मांग नहीं छोड़ेगी और ऐतिहासिक प्रदर्शन स्थल को सूची से हटाए जाने को शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन से पीछे हटने की वजह के रूप में स्वीकार नहीं करेगी।