सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को कहा कि ‘केशवानंद भारती’ मामला महज एक कानूनी मिसाल नहीं था, बल्कि यह संवैधानिकता और कानून के शासन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की सबसे गहरी पुष्टि के रूप में सामने आया। केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार’ मामले में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 1973 में ऐतिहासिक फैसला दिया था, जिसमें संविधान के ‘मूल ढांचे के सिद्धांत’ को प्रतिपादित किया गया था। इसने संविधान में संशोधन करने की संसद की व्यापक शक्ति को सीमित कर दिया तथा न्यायपालिका को उल्लंघन के आधार पर किसी भी संशोधन की समीक्षा करने का अधिकार दिया।
ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए सीजेआई ने कहा, केशवानंद मामले में बहुमत की असली प्रतिभा इस बात को पहचानने में निहित है कि जिसे संशोधित नहीं किया जा सकता, वही संविधान को सार्थक बनाता है। वह है उसकी आत्मा, जिसे डॉ. बीआर आंबेडकर के दूरदर्शी मार्गदर्शन में हमारे निर्माताओं ने बड़ी मेहनत से रचा था। उन्होंने कहा, मैं केशवानंद भारती मामले को सिर्फ एक कानूनी मिसाल नहीं मानता। बल्कि, यह संविधानवाद और कानून के शासन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की सबसे गहरी पुष्टि है।
सीजेआई ने कहा, वास्तविक मूलभूत सिद्धांत हमें यह याद दिलाता रहता है कि हमारा संविधान कोई क्षणिक राजनीतिक दस्तावेज नहीं है। यह राज्य और नागरिक के बीच एक अनुबंध है। जैसा कि वकीलों के समूह ने लगभग 50 साल पहले पीठ को बताया था, यह शक्ति को सीमित करता है, उसे कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सभ्य बनाने के लिए। यही कारण है कि केशवानंद भारती को दोबारा पढ़ने वाली हर पीढ़ी यह समझती है कि संविधान की ताकत स्याही या चर्मपत्र में नहीं, बल्कि उन लोगों की ईमानदारी में निहित है जो इसकी व्याख्या और बचाव करते हैं।
मुकदमा यह था
केरल सरकार भूमि सुधार कानून-1969 के तहत कासरगोड स्थित एडनीर मठ पर कब्जा करना चाहती थी। यहां के शंकराचार्य केशवानंद श्रीपदगलवरु ने इसका विरोध किया। वे मठ का प्रबंधन अपने पास रखना चाहते थे ताकि सरकार का इसमें हस्तक्षेप न हो। फरवरी, 1970 में उन्होंने मुकदमा दायर कर केरल सरकार के कदम को अपने धर्म, संपत्ति व अन्य मूल अधिकारों का उल्लंघन करार दिया। 31 अक्तूबर, 1972 को मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई, जो 23 मार्च, 1973 तक यानी पांच महीने चली। मुकदमा 68 दिन सुना गया। याची की ओर से नानीभाई पालकीवाला के नेतृत्व और फली एस नरीमन व सोली सोराबजी के सहयोग से यह मुकदमा लड़ा गया।
केस की पृष्ठभूमि
दो दशक से संसद व न्यायपालिका के बीच जारी संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह मुकदमा लड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट फरवरी, 1967 में ही गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार व अन्य मुकदमे में साफ कर चुकी थी कि संविधान से नागरिकों को मिले अधिकारों में संसद संशोधन नहीं कर सकती। इस पर संसद ने एक संशोधन किया जिसके तहत वह संविधान के किसी भी हिस्से में बदलाव कर सकती थी। कानून भी पास किया कि न्यायपालिका इन पर पुनर्विचार नहीं कर सकती। उस दौरान केंद्र सरकार भूमि सुधारों के लिए संपत्ति के अधिकार को सीमित करने के लिए कदम उठा रही थी, जबकि नागरिकों को संपत्ति का मूल अधिकार मिला हुआ था। यह अधिकार 1978 में खत्म हुआ। यही अधिकार केशवानंद भारती मुकदमे में मुख्य विषय था।
संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय में कहा कि मूल अधिकार संविधान संशोधन के तहत खत्म नहीं किए जा सकते। हालांकि संपत्ति के मालिकाना हक को सीमित करने के कानूनों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज नहीं किया। यह साफ किया कि संसद चाहे तो संशोधन कर सकती है, लेकिन यह संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे को तोड़ने या बदलने वाले नहीं हो सकते। 13 जजों ने इस मुकदमे में 11 निर्णय किए। चार जजों ने निर्णय पर हस्ताक्षर नहीं किए। तत्कालीन चीफ जस्टिस सर्वमित्र सीकरी ने कहा, 'मूल अधिकारों को किसी भी दशा में निरस्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, इन्हें जनहित में तार्किक ढंग से संक्षिप्त किया जा सकता है। संविधान के हर प्रावधान को संशोधित किया जा सकता है, पर इसकी बुनियाद और भावना को क्षति या तबाह नहीं कर सकते।'