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'AI विकल्प नहीं सहयोगी है, इससे डरे नहीं': मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चेताया, कहा- सचेत होकर करें इस्तेमाल

Sat, 18 Apr 2026 04:02 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, बंगलूरू।

सार

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक प्रणाली में एआई के बढ़ते उपयोग के बीच मानवीय विवेक और संवैधानिक नैतिकता को सर्वोपरि बताया है। उन्होंने न्यायाधीशों को सलाह दी कि वे एआई को शोध और डाटा प्रबंधन के लिए एक उपयोगी उपकरण के रूप में अपनाएं, लेकिन इससे मिली जानकारी पर आंख बंद करके भरोसा न करें।
 
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सूर्यकांत, भारत के मुख्य न्यायाधीश - फोटो : @PTI
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विस्तार
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भारतीय न्यायपालिका में तकनीक का प्रवेश एक बड़े बदलाव का संकेत है, लेकिन यह बदलाव मानवीय संवेदनाओं और संवैधानिक नैतिकता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। शनिवार को बंगलूरू में आयोजित न्यायिक अधिकारियों के 22वें द्विवार्षिक राज्य-स्तरीय सम्मेलन में देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और न्याय प्रणाली के अंतर्संबंधों पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी।
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मशीन और मनुष्य के बीच का संतुलन
'एआई के युग में न्यायपालिका की पुनर्कल्पना' विषय पर बोलते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को एआई से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा, 'जब आपके सामने जटिल कानूनी सवाल आते हैं, तो आप अधिक धैर्य और गहराई से विचार करते हैं। एआई के साथ भी हमें यही रुख अपनाना होगा। इसे सावधानी और सचेत होकर इस्तेमाल करें, जिससे आपके भीतर बैठा 'जज' किसी तकनीकी उपकरण से प्रभावित न हो।'

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एआई केवल एक सहायक हो सकता है, विकल्प नहीं। न्याय की प्रक्रिया केवल डाटा का विश्लेषण नहीं है, बल्कि यह एक चिंतनशील और नैतिक कार्य है जो संवैधानिक मूल्यों से निर्देशित होता है।
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एआई की 'भ्रम' वाली दुनिया से खतरा
मुख्य न्यायाधीश ने एआई के बढ़ते खतरों, विशेषकर हैलुसिनेशन यानी भ्रम पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि एआई का दुरुपयोग भ्रामक याचिकाओं और सतही तौर पर आकर्षक लेकिन कानूनी रूप से खोखले दावों को पेश करने के लिए किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश का कहना है कि इससे पहले से ही बोझ तले दबी न्याय व्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा। 

'ऊर्जा न्याय के सिद्धांतों पर टिकी होनी चाहिए देश की विकास यात्रा'
इतना ही नहीं, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने देश के विकास मॉडल को लेकर एक बड़ा विजन साझा किया। उन्होंने कहा कि केवल वही विकास तर्कसंगत है जो पर्यावरण के प्रति जवाबदेह हो। सीजेआई ने कहा कि भारत की 2047 की विकास यात्रा 'ऊर्जा न्याय' के सिद्धांतों पर टिकी होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने इस धारणा को सिरे से खारिज कर दिया कि हमें विकास और पर्यावरण में से किसी एक को चुनना होगा। उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र के रूप में हम अभी विकास के सफर पर हैं, इसलिए हम पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक प्रगति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मान सकते। 

संविधान और न्यायपालिका की नई भूमिका
सीजेआई ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों ही 'जीवन के अधिकार' का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि अदालतें सिर्फ 'प्रदूषण करो और भुगतान करो' के सिद्धांत तक सीमित नहीं हैं। अब सवाल यह पूछा जाता है कि क्या आपने प्रदूषण को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किए? उन्होंने कहा कि अदालतें वायु प्रदूषण और नदियों की सफाई जैसे मुद्दों पर लगातार निगरानी रखती हैं।
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ल ही में एक पैरामेडिकल अस्पताल तक सड़क बनाने के लिए 700 पेड़ काटने की अनुमति देने के फैसले का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे कोर्ट ने इसके बदले 1.75 लाख पेड़ लगाने का आदेश देकर 'पुनर्स्थापनात्मक दृष्टिकोण' अपनाया।

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