राजग में मौजूद जदयू इस बिल का विरोध कर रही है। जदयू ने इससे पहले भी तीन तलाक बिल का विरोध किया था। हालांकि तीन तलाक बिल पर वोटिंग के दौरान पार्टी के सदस्य संसद के दोनों सदनों में अनुपस्थित रहे, जिसका सरकार को परोक्ष लाभ मिला। माना जा रहा है कि जदयू इस बिल पर भी तीन तलाक की तर्ज पर वॉकआउट करने का विकल्प ही आजमा सकती है।
सरकार को 7 निर्दलीयों-नामित सदस्यों का समर्थन
240 सदस्यीय राज्यसभा में राजग अपने दम पर वर्तमान में बहुमत के बेहद करीब है। फिर सरकर को तीन नामित तो 4 निर्दलीय सांसदों का समर्थन हासिल है। इसके अलावा टीआरएस (6), बीजेडी (7), वाईएसआर कांग्रेस (2), शिवसेना (3) का रुख भी बिल के प्रति सकारात्मक है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार इस बिल पर उच्च सदन में भी महज औपचारिकता ही निभाई जाएगी।
नागरिकता संशोधन बिल से चिंतित हैं पूर्वोत्तर के जनजातीय समूह
नागरिकता संशोधन बिल का उत्तर-पूर्वी राज्यों में बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है। नागरिकों के बड़े हिस्से और संगठनों ने इस बिल को असम समझौते-1985 के प्रावधानों के खिलाफ बताया है, जिसमें 24 मार्च, 1971 से बाद वहां बसने वाले सभी नागरिकों को बाहरी मानते हुए निर्वासित करने की बात कही गई है। उत्तर-पूर्वी छात्रों के संगठन नेस्को ने 10 दिसंबर को क्षेत्र में 11 घंटे के बंद की घोषणा की हुई है।
क्या है बिल में
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक अत्याचार के चलते भारत में 31 दिसंबर, 2014 तक शरण लेने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के सभी लोगों को अवैध घुसपैठिया नहीं माना जाएगा, बल्कि इन्हें भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी। इन नागरिकों पर नागरिकता पाने के लिए भारत में रहने की बाध्यता अवधि को भी 11 साल के बजाय घटाकर 6 साल माना जाएगा।
भाजपा के चुनावी वादों में है शामिल
भाजपा ने 2014 और उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनावों में भी नागरिकता संशोधन बिल पारित कराने का वादा अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार के कार्यकाल में भी इस बिल को लोकसभा में पारित करा दिया गया था, लेकिन तब राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन की कमी के कारण यह पारित नहीं हो पाया था और बाद में 16वीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही खत्म हो गया था।
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के प्रतिनिधित्व के लिए तय सीटों का आरक्षण अगले 10 साल के लिए बढ़ाने की तैयारी है। इससे जुड़ा हुआ संविधान (126वां) संशोधन बिल सोमवार को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। हालांकि विधायिका में एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्यों को नामित करने का प्रावधान अगले साल जनवरी से खत्म कर दिया जाएगा।
बता दें कि इन सभी समुदायों के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में तय किए गए आरक्षण की समयसीमा 25 जनवरी, 2020 को पूरी हो रही है। संविधान में 126वें संशोधन से जुड़े बिल के मुताबिक, 1950 में 26 जनवरी को संविधान लागू होने के बाद एससी, एसटी और एंग्लो-इंडियन समुदाय को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 334 के तहत इन समुदायों को 70 साल तक के लिए आरक्षण दिया गया था। नए संशोधन में एससी-एसटी के लिए आरक्षण की समयसीमा बढ़ाकर 25 जनवरी, 2030 करने का प्रस्ताव रखा गया है, लेकिन एंग्लो-इंडियन समुदाय को इसकी जद से बाहर कर दिया गया है।
फिलहाल एससी-एसटी प्रतिनिधित्व
- 84 सदस्य एससी समुदाय और 47 सदस्य एसटी समुदाय से चुनकर आते हैं लोकसभा में
- 614 एससी सदस्य हैं पूरे देश की सभी विधानसभाओं में, जबकि एसटी की संख्या है 554