केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संवेदनशील इलाकों में स्थित तीनों एयरपोर्ट 'जम्मू-श्रीनगर-लेह' की सुरक्षा कमान सीआईएसएफ को सौंपने के लिए गत वर्ष 12 नवंबर को आदेश जारी किए थे। पिछले साल गर्मियों में खासतौर पर लेह एयरपोर्ट के बारे में खुफिया एजेंसियों की ओर से एक इनपुट भी जारी किया गया था। इसमें लेह एयरपोर्ट पर मुंबई जैसे आतंकी हमले को अंजाम देने की संभावना जताई गई थी।
इसके बाद गृह मंत्रालय एवं और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों ने लेह एयरपोर्ट के अलावा जम्मू-कश्मीर क्षेत्र के तीनों एयरपोर्ट यानी जम्मू-श्रीनगर-लेह की सुरक्षा व्यवस्था का गहराई से विश्लेषण किया। सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों का कहना था कि जांच के दौरान कई तरह की सुरक्षा खामियां सामने आई थीं।
जिस मुस्तैदी के साथ दिल्ली या दूसरे मेट्रो सिटी में स्थित एयरपोर्ट पर सुरक्षा व्यवस्था देखने को मिलती है, वैसी इन तीनों एयरपोर्ट पर नहीं थी। कई मामलों में तो सुरक्षा के तय मापदंड भी पूरे नहीं हो रहे थे। एयरपोर्ट सुरक्षा व्यवस्था के उच्चस्तरीय मापदंडों को पूरा करने के लिए ही तीनों हवाईअड्डों की सुरक्षा सीआईएसएफ के हवाले करने की सिफारिश की गई थी।
रक्षा कारणों से श्रीनगर, लेह और जम्मू हवाई अड्डे से यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए चेक-इन के बाद सामान की पहचान अनिवार्य थी। इससे यात्रियों को काफी परेशानी हो रही थी, लेकिन सुरक्षा कारणों से यह जरूरी था। जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु से इस प्रक्रिया को खत्म करने का आग्रह किया था। कुछ दिन बाद अनिवार्य सामान पहचान प्रक्रिया खत्म कर दी गई थी।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियों को इस बात पर ऐतराज था और वे इसे सुरक्षा में चूक मान रही थीं, लेकिन नई व्यवस्था लागू करने के आदेश ऊपर से आए थे, इसलिए सभी एजेंसियां मौन साधे रहीं। देश के 61 बड़े एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सीआईएसएफ संभाल रही है। इनके अलावा 39 अन्य एयरपोर्ट पर संबंधित राज्यों की पुलिस या दूसरे सुरक्षा बल तैनात हैं।
पिछले साल नवंबर में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तीनों एयरपोर्ट की सुरक्षा कमान सीआईएसएफ को सौंपने के लिए सर्वे शुरु करने का आदेश दिया था। संबंधित एजेंसियों ने इस बारे में जानकारी जुटा ही रही थीं कि फरवरी में पुलवामा हमला हो गया। उसके बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक और फिर लोकसभा चुनाव आ गए। इन सबसे राहत मिली तो अगस्त में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर में बहुत सी पाबंदियां लगा दी गई। अब जाकर उन पाबंदियों में ढील मिली है।
सीआईएसएफ के डीआईजी अनिल पांडे का कहना है कि जल्द ही तीनों एयरपोर्ट पर संसाधन एवं उपकरणों के लिए सर्वे प्रक्रिया शुरु की जा रही है। चूंकि ये तीनों हवाईअड्डे विशेष सुरक्षा के तहत आते हैं, इसलिए यहां पर अन्य एयरपोर्ट के मुकाबले सीआईएसएफ जवानों की अधिक संख्या तैनात की जाएगी। तीनों एयरपोर्ट पर कुल मिलाकर करीब दो हजार जवान तैनात होंगे। लेह एयरपोर्ट पर उड़ानों की संख्या बढ़ने के बाद यहां अतिरिक्त जवानों की तैनाती होगी। शुरू में छह सौ जवान एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था संभालेंगे।
बता दें कि पिछले कुछ माह से भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही तनातनी के बाद देश के सभी एयरपोर्ट की सुरक्षा बढ़ाई जा रही है। मौजूदा समय में जिस तरह के इंटेलीजेंस इनपुट आ रहे हैं, उनमें ड्रोन से हमला करना भी एक बड़ा खतरा है। एयरपोर्ट के अलावा हवाई जहाजों को भी ड्रोन से निशाना बनाया जा सकता है। हवाई जहाज टेक ऑफ और लैंडिंग के दौरान जब सात आठ सौ मीटर की उंचाई पर होता है, तो उसकी राह में ड्रोन आ सकता है। हवाई जहाजों के करीब ड्रोन न आने पाए, इसके लिए एटीसी को खास हिदायतें जारी की गई हैं। सुरक्षा एजेंसियों की तरफ से जैसे ही किसी ड्रोन की सूचना एटीसी को दी जाएगी, तुरंत वह इनपुट पायलट के पास पहुंचाया जाएगा। पायलट बिना किसी देरी के अपना रास्ता बदल लेंगे।
ड्रोन हमले के खतरे को देखते हुए अब सौ एयरपोर्ट्स को रेड जोन में शामिल कर लिया गया है। इन एयरपोर्ट पर चार स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू रहेगी। सीआईएसएफ, एटीसी (एयर ट्रैफिक कंट्रोलर), एयरफोर्स और लोकल पुलिस की स्पेशल यूनिट ड्रोन पर नजर रखेगी। ये चारों एजेंसियां संयुक्त मैकेनिज्म पर काम करेंगी। किसी भी एयरपोर्ट के निकट कोई ड्रोन दिखाई पड़ा, तो उसे बिना किसी देरी के मार गिराया जाएगा।
सीआईएसएफ को एलएमजी सहित दूसरे ऐसे हथियार मुहैया करा दिए गए हैं, जिनकी मारक क्षमता छह सौ मीटर तक है। अगर इससे उपर कोई ड्रोन है, तो उसे मार गिराने या जब्त करने की जिम्मेदारी एयरफोर्स की रहेगी। चारों एजेंसियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान बिना किसी देरी के हो, इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल शुरु किया जा रहा है।