बांग्लादेश को मोहरा बनाकर चीन अब भारत के खिलाफ मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में जुटा है। वह बांग्लादेश में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के लिए मेंटीनेंस सेंटर बनाने में लगा है।इनमें उन मिसाइलों के रखरखाव की सुविधा दी जाएगी, जिन्हें चीन ने 2011 में बांग्लादेश को दिया था। इस मेंटीनेंस सेंटर को बनाने की बात गोपनीय रखी गई है। इस बारे में चीन या बांग्लादेश की तरफ से कोई घोषणा नहीं की गई है।
पाकिस्तान के बाद दूसरा बड़ा ग्राहक बांग्लादेश
बांग्लादेश पहले ही चीन के लिए रक्षा निर्यात का एक बड़ा बाजार बन चुका है। स्वीडन की संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक चीन ने 2016 से 2020 तक जितने सैन्य निर्यात किए, उनमें 17 फीसदी बांग्लादेश ने खरीदा। इस तरह वह पाकिस्तान के बाद चीन का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा ग्राहक बन गया है। बांग्लादेश और चीन के बीच रक्षा सहयोग का समझौता 2002 में हुआ था। उसमें रक्षा उत्पादन में सहयोग की बात भी शामिल थी। उसके बाद से दोनों देशों में रक्षा सहयोग बढ़ता गया है। बीते कुछ वर्षों के दौरान बांग्लादेश के सैनिक ट्रेनिंग लेने के लिए चीन भी गए हैं।
दोनों देशों के बीच हुए रक्षा सौदों की सामने आई जानकारी के मुताबिक 2016 में चीन ने बांग्लादेश को दो पनडुब्बियां दीं। ये सौदा 20 करोड़ डॉलर से अधिक रकम में हुआ। कूटनीतिक विशेषज्ञों ने कहा है कि बांग्लादेश जिस तेजी से चीन के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, उससे दक्षिण एशिया में नई चिंताएं पैदा हो सकती हैँ। खासकर यह भारत के लिए चिंता का पहलू है।
भारत पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव
नई दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीनी अध्ययन के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने कहा- ‘बांग्लादेश में मिसाइल सुविधा केंद्र स्थापित करना और उसके साथ अन्य प्रकार के सैन्य संबंध बनाना और कुछ नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ चीन का मनोवैज्ञानिक युद्ध है। चीन भारत को यह संदेश देना चाहता है कि बांग्लादेश अब उसके पाले में आ गया है।’ हालांकि कोंडापल्ली ने कहा कि चीन और बांग्लादेश की दोस्ती से भारत के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा नहीं होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि एक संप्रभु देश के निर्णय में दखल देना भारत के लिए संभव नहीं है।