विदेश नीति के मोर्चे पर साल 2016 भारत के लिए बेहतरीन वर्ष साबित हुआ है। बेहतरीन इस अर्थ में कि इस मोर्चे पर भारत की झोली में नाकामियां गिनी चुनी रही, मगर उपलब्धियों का भरमार रहा। खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताबड़तोड़ विदेश दौरे ने दुनिया के मंच पर भारत को नई पहचान दी। प्रधानमंत्री ने ताकवतर देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बेहतर संबंध स्थापित करने के अलावा पाकिस्तान के वर्चस्व वाले मुस्लिम देशों में भी भाजपा की पैठ मजबूत कर दी।
हालांकि साल 2016 के जाते जाते वैश्विक राजनीति में एकाएक आए परिवर्तन ने आने वाले साल के लिए मोदी सरकार की विदेश नीति के लिए अग्नि परीक्षा की नींव रख दी है। इसका कारण अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना और कई मोर्चे पर नीति स्पष्ट न होना, रूस-पाकिस्तान-चीन की बन रही मजबूत तिकड़ी के अलावा मोदी सरकार की ओर से लिया गया नोट बंदी का फैसला है।
खासतौर से अगर नोटबंदी के फैसले के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा तो निश्चित रूप से हालात संभालना बेहद मुश्किल होगा। क्योंकि वर्तमान वैश्विक दौर में विदेश नीति की सफलता-असफलता के लिए किसी भी देश की आर्थिक परिस्थिति सबसे बड़ा कारण बनती है।
उपलब्धियों की बात करें तो साल 2016 ने भारत को दुनिया में एक नई पहचान दी। भारत ताकतवर देशों ही नहीं बल्कि सामरिक, कूटनीतिक दृष्टिï से महत्वपूर्ण देशों को भी साधने में सफल रहा। खासतौर पर आतंकवाद के सवाल पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की रणनीति मजबूती से आगे बढ़ी और भारत ने कई मौकों पर चीन के समर्थन के बावजूद पाकिस्तान को आईना दिखाया।
हम इस साल एमटीआर के सदस्य बने, रूस के साथ एयर डिफेंस सिस्टम समझौता हुआ। एनएसजी और यूएन की सदस्यता मामले में दावेदारी और मजबूत हुई। पड़ोसी देशों में पाकिस्तान-चीन को छोड़ कर अन्य देशों से रिश्तों में मजबूती आई। खासतौर पर इस दौरान पीएम मोदी-अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच बने परस्पर विश्वसनीय संबंध बड़ी उपलब्धि साबित हुई।
जहां तक निकट भविष्य का सवाल है तो कई कारणों से मोदी सरकार की चुनौतियां बढने वाली हैं। खासतौर से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की जीत ने दुनिया को उलझा कर रख दिया है। उनकी नीति में अस्पष्टïता के कारण पूरी दुनिया 20 जनवरी का इंतजार कर रही है जब डोनाल्ड विभिन्न मुद्दों और मोर्चे पर अपनी स्थिति स्पष्टï करेंगे। जाहिर तौर पर अगर अमेरिका और रूस के संबंध बेहतर हुए तो भारत बेहतर स्थिति में रहेगा।
इसके विपरीत अगर चीन-पाकिस्तान-रूस की तिकड़ी मजबूत हुई तो भारत को चौतरफा मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। वैसे भी रूस की पाकिस्तान से बढ़ रही नजदीकियां भारत के लिए पहले से मुश्किलें खड़ी कर रहा है। फिर अगर ट्रंप अपने वादे के मुताबिक चीन की नकेल कसने में लगे तो दक्षिण चीन महासागर में दोनों देशों के बीच तकरार बढ़ेगा। फिर अमेरिका चीन को सबक सिखाने के लिए भारत की समुद्री सीमा का उपयोग करना चाहेगा। ऐसे में भारत और चीन की तनातनी बढ़ेगी।
मैंने सबसे पहले नोट बंदी का जिक्र किया है। वैश्विक स्तर पर इसके संदेश सकारात्मक नहीं जा रहे। अगर इससे अर्थव्यवस्था लडख़ड़ाई तो विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार को लेने के देने पड़ जाएंगे। खासतौर से अगर विकास दर में गिरावट आई तो आर्थिक लाभ नहीं मिलता देख ताकतवर देश भी दूसरे देश की ओर रुख करेंगे। इसमें चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत की चिंता का कारण बनेगा, जिसमें रूस भी शामिल होने के लिए बेकरार बैठा है।
(हिमांशु मिश्र से बातचीत पर आधारित)