भारत-चीन के रिश्ते कभी-कभी तनावपूर्ण स्थिति में रहते हैं। कभी सीमा विवाद तो कभी पाकिस्तान के मुद्दे पर चीन का रुख भारत को परेशानी में डालता रहता है। लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों में भी हिंदी दोनों देशों के बीच संबंधों को एक नया आयाम देने की कोशिश करती रहती है। भारत में कुछ लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो सकता है कि कुछ चीनी छात्रों को हिंदी इतनी पसंद आई कि उन्होंने अपना नाम भी हिंदी में रख लिया। हिंदी के इसी जादू का असर है कि आज चीन में आपको गणेश, बरखा, शांति, खुशी, बांसुरी और संस्कृति जैसे हिंदी नाम के लोग मिल जाएंगे। आज चीन की लीयांग मान अब अमृता बन चुकी हैं तो ली हांगयूमिंग अब अद्विका बन गई हैं। ली यू शिआन अब खुद को अंजली कहलाना पसंद करती हैं तो ली पिन अब प्रभात बन चुके हैं। इन छात्रों की एक लंबी श्रृंखला है।
दरअसल, चीन के पेकिंग प्रांत में पेइचिंग विश्विविद्यालय में कुछ छात्र हिंदी भाषा सीख रहे हैं। इन छात्रों ने हिंदी भाषा सीखने के क्रम में भारतीय संस्कृति को काफी करीब से जाना और इससे काफी प्रभावित हुए। और उन्होंने अपने मूल नाम के साथ-साथ हिंदी नाम भी रख लिया।
इन छात्रों को हिंदी सिखाने वाले प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र शुक्ला ने अमर उजाला को बताया कि मेरा मानना है कि भाषा और संस्कृति का अटूट संबंध होता है। भाषा सीखने के दौरान ही आप उस भाषा की संस्कृति भी सीख जाते हैं। अगर कोई भाषा आपको अच्छी तरह से सीखनी है तो सबसे पहले आपको उस भाषा की जननी संस्कृति से प्यार होना चाहिए। अपनी इसी सोच के कारण मैंने छात्रों को हिंदी नाम रखने के लिए प्रेरित किया जो आज भी जारी है।
हिंदुस्तान और चीन की संस्कृतियों में काफी समानताएं
डॉ. देवेंद्र शुक्ला ने बताया कि अपने अध्ययन के दौरान मैंने पाया था कि हिंदुस्तान और चीन की संस्कृतियों में काफी समानताएं हैं। कालिदास की रचनाओं में क्रौंच-रंध्र शब्द का प्रयोग हुआ है, बाल्मीकि रामायण में भी इस शब्द का उपयोग हुआ है। चीन की मंदारिन भाषा के प्रसिद्ध कवि ली पाई ने भी इसी तरह के शब्द का प्रयोग हिमालय के संदर्भ में बर्ड्स होल के रूप में किया है।
हिंदुस्तान के फल-फूल और उनके कुछ नाम भी चीन की संस्कृति में देखे जा सकते हैं। ह्वेनसांग की रचनाओं में भी इस तरह के शब्द मिलते हैं जिनसे हिंदुस्तानी संस्कृति और चीनी संस्कृति के करीब होने का पता चलता है। हिंदी के विद्वान डॉ. देवेंद्र शुक्ला ने बताया कि पेइचिंग यूनिवर्सिटी के हिंदी विभागाध्यक्ष चांग चिंग ख्वे ने दिल्ली के केंद्रीय हिंदी संस्थान से हिंदी भाषा का ज्ञान लिया है।
केंद्रीय हिंदी संस्थान के नेतृत्व में इस समय अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है। इसमें चीन, जापान, रूस, तुर्की, यूक्रेन और हांगकांग जैसे अनेक देशों के छात्रों ने भाग लिया। छात्रों ने अपने देश की संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों को भी प्रदर्शित किया। यूनेस्को ने हर साल 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की थी।