चीन की लगातार भारत को चारों तरफ से घेरने की कोशिशों ने भारतीय राजनयिकों की चिंता बढ़ा दी है। दक्षिण एशिया और आसियान मामलों के विशेषज्ञ सूत्र के अनुसार चीन की वन बेल्ट, वन रोड नीति, रिंग पर्ल की नीति लगातार भारत को चारों तरफ से घेर रही है।
इससे आने वाले समय में भारत के व्यापार, सुरक्षा, तथा ब्लू वॉटर इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ सकता है। चीन ने केवल श्रीलंका के साथ बल्कि नेपाल, पाकिस्तान, मालदीव समेत कई देशों के तेजी से सामारिक और व्यापारिक रिश्ते को गति दे रहा है।
विदेश नीति मामलों के जानकार राजीव शर्मा का भी कहना है कि चीन समुद्री क्षेत्र, रेल, सडक़ समेत सभी संपर्क मार्गों को विस्तार करने में लगा है। इसके बरअक्स भारत की स्थिति लगातार चिंता बढ़ाने वाली बन रही है।
हाल में चीन ने नेपाल के साथ वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में समझौता किया है। इसके तहत चीन तिब्बत के रास्ते नेपाल तक सडक़ मार्ग के विकास को धार देगा। इसी क्रम में चीन नेपाल तक अपने रेलमार्ग के विकास को भी गति दे रहा है।
उसकी योजना रसुआगढ़ से नेपाल के बीरगंज तक अपनी रेल सेवा लेकर आने की है। बीरगंज से बिहार राज्य से सटा हुआ(करीब240 किमी) है। इसके अलावा नेपाल में लगातार चीन की मौजूदगी बढ़ रही है।
यही स्थिति श्रीलंका में भी है। चीन ने श्रीलंका हंबनटोटा बंदरगाह के विकास में रुचि दिखाई थी। पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच में लगातार आवाजाही बढ़ रही है। चीन श्रीलंका की 18 परियोजनाओं में दिलचस्पी ले रहा है।
हंबनटोटा पोर्ट का विकास, आपरेशन, इंडस्ट्रियल जोन, कोलंबो पोर्ट सिटी का विकास प्रमुख है। श्रीलंका में सडक़ आदि का जाल बिछाने के लिए चीन ने परियोजनाओं में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी है।
अफगानिस्तान में चीन की दिलचस्पी बढ़ रही है और पाकिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह के विकास से लेकर बिजिंग तक सिल्क रोड का विकास उसके एजेंडे में है। यूरोप और एशिया को सडक़ मार्ग से जोडऩे की नीति पर काम कर रही है।
इसी के अंर्तगत उसकी योजना अपनी कनेक्टिविटी के विस्तार है। जबकि भारत लगातार पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरने वाली चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना का विरोध कर रहे है। चीन की इन्ही कोशिशों को संतुलित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मई के दूसरे सप्ताह में श्रीलंका का दौरा किया था।