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बांग्लादेश में चीन की बढ़ती चाल: संसदीय समिति ने केंद्र को किया सतर्क; चौबीसों घंटे निगरानी की सिफारिश

Thu, 30 Jul 2026 11:14 PM IST
प्रशांत तिवारी पीटीआई, नई दिल्ली

सार

संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति ने बांग्लादेश में चीन की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से वहां विदेशी शक्तियों की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखने की सिफारिश की है। साथ ही भारत-बांग्लादेश संबंधों को और मजबूत करने, सीमा सुरक्षा बढ़ाने और आधुनिक निगरानी तंत्र अपनाने पर भी जोर दिया गया है।
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संसद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बांग्लादेश में चीन की बढ़ती मौजूदगी, खासकर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर चिंता जताते हुए संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति ने केंद्र सरकार से सिफारिश की है कि वह पड़ोसी देश में विदेशी शक्तियों की गतिविधियों पर लगातार और करीबी निगरानी रखे। समिति का कहना है कि यदि कोई भारत-विरोधी देश बांग्लादेश में सैन्य आधार स्थापित करने की कोशिश करता है तो यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने यह भी कहा कि भारत को विकास सहयोग के क्षेत्र में अपनी बढ़त का उपयोग करते हुए बांग्लादेश के सबसे भरोसेमंद साझेदार के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करनी चाहिए।

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किस रिपोर्ट में सामने आईं ये सिफारिशें?
यह सिफारिश संसद में गुरुवार को पेश की गई समिति की रिपोर्ट में की गई है। रिपोर्ट का शीर्षक है-'भारत-बांग्लादेश संबंधों के भविष्य' विषय पर समिति की नौवीं रिपोर्ट में की गई सिफारिशों पर सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा। इसमें भारत और बांग्लादेश के बदलते सामरिक संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई है।

चीन की बढ़ती मौजूदगी पर समिति ने क्या चिंता जताई?
समिति ने कहा कि बांग्लादेश में चीन की बढ़ती भूमिका, विशेषकर आधारभूत ढांचा, बंदरगाह विस्तार और रक्षा सहयोग के क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट में विशेष रूप से मोंगला पोर्ट परियोजना और लालमोनिरहाट एयरबेस का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन परियोजनाओं पर चीन की सक्रिय भागीदारी भारत के लिए चिंता का विषय है।
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मोंगला पोर्ट परियोजना क्यों बनी चिंता का कारण?
समिति ने बताया कि मार्च 2025 में बांग्लादेश ने चीन के साथ 37 करोड़ अमेरिकी डॉलर (370 मिलियन डॉलर) की लागत से मोंगला बंदरगाह के विस्तार का समझौता किया था। इस परियोजना को क्षेत्र में चीन की रणनीतिक पकड़ मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

लालमोनिरहाट एयरबेस को लेकर क्या कहा गया?
रिपोर्ट में कहा गया कि लालमोनिरहाट एयरबेस का विकास चीन की सहायता से किया जा रहा है। हालांकि बांग्लादेश सेना के सैन्य संचालन महानिदेशक ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इस हवाई पट्टी को सैन्य उपयोग के लिए उन्नत बनाने की कोई योजना नहीं है। इसके बावजूद समिति ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया क्योंकि यह एयरबेस भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा से महज 15 किलोमीटर दूर स्थित है।

विदेशी शक्तियों की गतिविधियों पर निगरानी की सिफारिश क्यों?
समिति ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह बांग्लादेश में विदेशी शक्तियों की सभी गतिविधियों पर लगातार नजर रखे। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि कोई भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण देश वहां सैन्य मौजूदगी स्थापित करने का प्रयास करता है तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्र और सामरिक हितों पर पड़ सकता है।

जमात-ए-इस्लामी के चीन दौरे का क्या महत्व बताया गया?
समिति ने हाल ही में जमात-ए-इस्लामी के चीन दौरे का भी उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार यह यात्रा इस बात का संकेत है कि चीन बांग्लादेश के विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूहों के साथ अपने संबंधों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है, जिससे उसका प्रभाव और मजबूत हो रहा है।

पेकुआ पनडुब्बी अड्डे को लेकर क्या जानकारी दी गई?
समिति ने बताया कि चीन ने बांग्लादेश के पेकुआ में ऐसा पनडुब्बी अड्डा विकसित किया है जहां आठ पनडुब्बियां रखी जा सकती हैं, जबकि बांग्लादेश के पास फिलहाल केवल दो पनडुब्बियां हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चीन लंबे समय से बांग्लादेश की विभिन्न आधारभूत ढांचा परियोजनाओं में शामिल रहा है और यह केवल हालिया राजनीतिक घटनाक्रम का परिणाम नहीं है।

भारत ने अपने हितों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए हैं?
विदेश मंत्रालय ने समिति को बताया कि मोंगला बंदरगाह को देश के अंदरूनी हिस्सों से जोड़ने के लिए भारत ने वित्तीय सहायता देकर खुलना-मोंगला रेल लाइन परियोजना पूरी कराई है। इसके अलावा भारत और बांग्लादेश के बीच चट्टोग्राम और मोंगला बंदरगाहों के उपयोग को लेकर भी समझौता हुआ है, जिससे भारत को पारगमन सुविधा मिलती है और उसके रणनीतिक हित सुरक्षित रहते हैं।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर और बंगाल की खाड़ी को लेकर क्या चेतावनी दी गई?
समिति ने कहा कि बांग्लादेश को अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदार चुनने का पूरा अधिकार है, लेकिन भारत के रणनीतिक और सुरक्षा हितों, विशेषकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी वजह से लालमोनिरहाट एयरबेस का विकास भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

बांग्लादेश में नई सरकार बनने के बाद क्या बदलाव आया?
फरवरी में हुए संसदीय चुनावों के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। इसके बाद अप्रैल में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खालिलुर रहमान भारत आए और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की। दोनों देशों ने लगभग डेढ़ वर्ष से अधिक समय से चले आ रहे तनाव के बाद संबंधों को सामान्य बनाने की प्रतिबद्धता जताई।

सीमा सुरक्षा को लेकर समिति ने क्या कहा?
समिति ने माना कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर अवैध घुसपैठ, तस्करी, कट्टरपंथ, और सीमा पार अपराध जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि सीमावर्ती इलाकों में रोजगार और आजीविका के सीमित अवसर लोगों को अवैध गतिविधियों की ओर धकेलते हैं, इसलिए इन सामाजिक-आर्थिक कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

बीएसएफ और बीजीबी की भूमिका को कैसे सराहा गया?
समिति ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) की संयुक्त गश्त, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और हॉटलाइन संचार व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि दोनों बल सीमा की सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

आधुनिक निगरानी व्यवस्था पर क्या सुझाव दिए गए?
समिति ने सरकार से ड्रोन, थर्मल कैमरे, मोशन सेंसर और सैटेलाइट आधारित निगरानी प्रणालियों जैसी आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग करने की सिफारिश की है, ताकि सीमा पर वास्तविक समय में निगरानी और अपराधों की रोकथाम अधिक प्रभावी ढंग से की जा सके।

बहु-एजेंसी समन्वय की जरूरत क्यों बताई गई?
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि राज्य सरकारों, केंद्रीय खुफिया एजेंसियों, जांच एजेंसियों और कानून प्रवर्तन संस्थाओं को साथ लेकर एक मजबूत बहु-एजेंसी समन्वय तंत्र विकसित किया जाए, जिससे सीमा पार अपराधों का समय रहते पता लगाया जा सके और उन पर तुरंत कार्रवाई हो सके।

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सीमा प्रबंधन को लेकर अंतिम सुझाव क्या है?
समिति ने कहा कि प्रभावी सीमा प्रबंधन केवल सुरक्षा बलों की तैनाती तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विकास, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और लोगों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना भी जरूरी है। समिति ने यह भी सिफारिश की कि सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम  को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि सीमावर्ती इलाकों में अपराध कम हों और सामाजिक वातावरण बेहतर बनाया जा सके।

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