भारत ने पिछले दशक से चीनी सैनिकों की घुसपैठ पर कभी आक्रामक रवैया नहीं अपनाया है। सैन्य झड़प से भी बचने की कोशिश की है और टैक्टिकल मूव से समस्या का समाधान तलाशने की पहल हुई है। इसके लिए नई दिल्ली ने हमेशा कूटनीतिक तरीकों को ही अजमाया।
दोकलाम में चीन के सैनिकों के साथ भारतीय सैनिकों के 73 दिनों तक उलझे रहने के दौरान तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इसका हल बातचीत से ही निकलने की वकालत की थी। कूटनीति के जानकार कहते हैं चीन से सीमा विवाद के मामले में भारत के पास एकमात्र विकल्प बातचीत और समझौता ही है। इसी नीति पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चले थे। इसी नीति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चल रहे हैं।
भारत की नीति पड़ोसी देशों से विश्वास बहाली के उपायों की रही है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीन से इसी आधार पर रिश्ते निभाए। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे नए दौर में पहुंचाया है। प्रधानमंत्री मोदी के समय में इनमें दो-तीन बड़े बदलाव हुए। भारत ने चीन से लगती सीमा पर अपने सुरक्षा बलों की गश्त और निगरानी बढ़ाई।
सुरक्षा बल बताते हैं कि इसमें थोड़ी आक्रमकता भी बढ़ाई गई। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने चीन की सीमा के पास धीमी गति से चल रही सड़क परियोजनाओं और संसाधनों के विकास में तेजी लाने का काम किया। दलाई लामा, तिब्बत जैसे मामले को लेकर चीन चिढ़ता था। इस तरह के मुद्दों पर भारत ने यथार्थवादी रवैया अपनाया।
भारत में चीन विरोधी गतिविधियों की गुंजाइश पर अंकुश लगाया। इसके अलावा भारत ने चीन के साथ शिखर नेताओं की अनौपचारिक बैठक को आगे बढ़ाया। इस क्रम में 2018 में वुहान प्रांत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पहली अनौपचारिक समिट हुई। दूसरी भारत के महाबलिपुरम में हुई। इसे दोनों देशों में विश्वास बहाली के उपाय के रूप में सराहा भी गया।
यह सवाल भारतीय रणनीतिकारों के दिमाग में भी है कि आखिर ऐसा कब तक? चीन के सैनिक आक्रामक तरीके से घुसपैठ करते हैं, भारतीय सुरक्षा बलों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। इसके समानांतर भारतीय सुरक्षा बल हमेशा रक्षात्मक और शांति की भूमिका में रहते हैं।
सैन्य मामलों के जानकार एयर वाइस मार्शल (पूर्व) एनबी सिंह कहते हैं कि इसका बड़ा कारण चीन के पास हमसे अधिक सैन्य तथा आर्थिक ताकत का होना है। लेकिन आप यह भी मत भूलिए कि भारत-चीन सीमा पर 1962 के बाद से कोई बड़ा सैन्य टकराव या स्थानीय सैन्य झड़प नहीं हुई है।
मेजर जनरल (पूर्व) लखविंदर सिंह भी यही कहते हैं। लखविंदर सिंह का कहना है कि लद्दाख में चीनी सैनिकों की आक्रमकता का स्तर चाहे जो रहा हो, लेकिन एक भी गोली नहीं चली है। वहीं चीन मामलों के जानकार स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीन अपनी सुप्रीमेसी का अब संदेश दे रहा है। वह चाहता है कि भारत इसे सहता रहे। इस बारे में विदेश मंत्रालय के अधिकारी फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं।