दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के कई नेताओं ने बच्चियों से रेप के दोषियों को फांसी की वकालत की। वहीं, बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और संगठनों ने ऐसे मामलों में मौत की सजा का विरोध किया है।
हक सेंटर की भारती अली का कहना है कि जिस देश में दोष साबित हो पाना ही सुनिश्चित नहीं है, वहां केंद्र सरकार और सख्त कानून लाना चाहती है। देश में ज्यादातर रेप के मामलों में करीबी रिश्तेदार शामिल होते हैं। ऐसे में मौत की सजा के कारण आरोपियों के बरी होने की दर बढ़ेगी। ज्यादातर मामलों में शिकायत ही नहीं की जाएगी।
अली का कहना है कि अगर ऐसे मामलों में 90 दिन के भीतर दोष साबित होने लगे तो घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य विनोद टिकू का कहना है, ‘मौत की सजा के कानून के कारण ज्यादातर लोग बच्चियों से रेप की शिकायत ही दर्ज नहीं कराएंगे।’
लंबित मामले निपटाने में ही लगेंगे दो दशक
कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रंस फाउंडेशन के हालिया अध्ययन के मुताबिक बच्चों से यौन अपराध के लंबित मामले निपटाने में ही अदालतों को दो दशक से ज्यादा लग जाएंगे। संगठनों का कहना है कि सरकार को मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करने, पीड़ितों व गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, तेज ट्रायल और लोगों को जागरूक करने पर ध्यान देना चाहिए।
इन देशों में है मौत की सजा का कानून
बच्चियों से रेप के मामले में दोषी पाए जाने पर चीन, कतर, सूडान, सऊदी अरब, तजाकिस्तान, ट्यूनीशिया, बांग्लादेश और कुवैत में मौत की सजा का कानून है।