सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विवेक (समझदारी) ज्ञान से अलग होता है और इसका मतलब यह जानना है कि कानून के शब्दों पर कब जोर देना है तथा कब उसके मकसद को समझना है।
बताया- कब बोलना है और कब खामोशी असरदार
सीजेआई रविवार को कोलकाता स्थित पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय (एनयूजेएस) के दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे। सीजेआई इसके चांसलर हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान किताबों, शायद क्लासरूम और ट्रेनिंग से जल्दी हासिल किया जा सकता है, लेकिन उसके बाद जो होता है, वह अनुभव, गलतियों और लगातार सोचने-समझने से बहुत धीरे-धीरे और अक्सर अधूरे तरीके से आकार लेता है। विवेक यह जानना है कि कब बोलना है और कब खामोशी ज्यादा असरदार होती है।
दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि यह जानना जरूरी है कि कानून के नियमों पर कब जोर देना है और कब उसके मकसद को समझना है। समारोह में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जॉयमाल्या बागची व कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल भी शामिल हुए।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हम ऐसे जमाने में रह रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है और बिना इंतजार किए जवाब की उम्मीद की जाती है। ऐसी दुनिया में समझदारी दुर्लभ हो गई है और इसलिए यह बहुत कीमती है। उन्होंने कहा कि जहां दक्षता निष्पक्षता के साथ मुकाबला करती है, जहां नंबरों में मापी गई प्रोफेशनल सफलता अजीब तरह से खोखली लगती है, ऐसे पलों में, सिर्फ नियम आपका मार्गदर्शन नहीं करेंगे, बल्कि आपकी समझदारी करेगी।
उन्होंने कहा कि कानूनी पेशा सिर्फ दिमागी तौर पर ही मुश्किल नहीं है, बल्कि यह भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी थकाने वाला है। अपने दशकों के अनुभव के बारे में सीजेआई ने कहा कि सही समय पर आराम करने और धीमे होने की क्षमता प्रोफेशनल जिम्मेदारी से पीछे हटना नहीं है, बल्कि यह उसे बनाए रखने का एक तरीका है।