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BJP शासित तीन राज्यों में SC-ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू, बवाल के बाद कैंसिल

Tue, 17 Apr 2018 02:53 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी कानून में बदलावों के आदेश बाद देशभर में इसका विरोध प्रदर्शन हो रहा है। 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान देशभर में विरोध प्रदर्शन और हिंसा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा था कि केंद्र सरकार दलितों की भलाई का काम कर रही है। लेकिन पीएम के भलाई के किए जा रहे काम के दावे के बीच बीजेपी शासित कुछ राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर काम करना शुरू कर दिया है।
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अंग्रेजी अखबार के मुताबिक छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान की सरकार ने आधिकारिक तौर पर राज्य पुलिस को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने का आदेश जारी कर दिया है। एससी-एसटी एक्ट पर छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार बैकफुट पर आ गई है। मिली जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की ओर से जारी निर्देश के पालन को लेकर छत्तीसगढ़ पुलिस की ओर से जो आदेश जारी किया गया था, बवाल के बाद उसे प्रदेश सरकार ने तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया है।

मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य एससी और एसटी बाहुल्य राज्य हैं, ऐसे में इस वर्ग के हितों की रक्षा के लिए सरकार हरसंभव कदम उठाएगी। उन्होंने कहा कि हम एससी-एसटी मामले में संवेदनशील है। जिस तरह से केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के एससी एसटी एक्ट को  लेकर विरोध कर रही है ठीक वैसे ही कोर्ट के इस निर्णय का हम भी विरोध करते हैं।
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उन्होंने कहा कि एससी-एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी की गई गाइड लाइन का पालन करने के लिए पुलिस मुख्यालय द्वारा सभी पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिखा गया था। एडीजी आरके विज ने एसपी रेलवे सहित प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों को निर्देश जारी किया था। इस पत्र में डॉ सुभाष महाजन खिलाफ महाराष्ट्र राज्य व अन्य में SC/ST अधिनियम के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए जारी दिशा-निर्देश का पालन करने का उल्लेख किया था।

SC/ST मुद्दे पर हो रहे विरोध के बीच प्रधानमंत्री ने कहा था कि आपके हक की चिंता करना सरकार का दायित्व है। मोदी ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सिर्फ भ्रम फैला सकती है, इस कोशिश की एक तस्वीर इस महीने की 2 तारीख को हम देख चुके हैं। 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय में SC/STएक्ट के तहत दर्ज मामले में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने को कहा था। जिसके बाद दलित संगठनों और नेताओं ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। पुनर्विचार याचिका की सुनवाई में भी कोर्ट ने कहा था कि जो लोग विरोध कर रहे हैं उन्होंने हमारा आदेश नहीं पढ़ा है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। 
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